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जिस मिल के विरोध ने बनाया विधायक आज वही मिल बना परिचायक

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गोंडा। कटरा विधानसभा की राजनीति में कई बार उथलपुथल मचा चुकी मैजापुर चीनी मिल वर्ष 1999 से विधान सभा चुनाव में हार जीत तय करने का पैमाना बनी है। मिल में एथेनाल प्लांट के शिलान्यास बाद अब इसे लेकर विरोध की राजनीति करने वालों के सुर भी बदल गए हैं।
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कभी मिल के विरोध से किसानों का भरोसा जीत कर विधान सभा तक पहुंचने वाले नेता भी अब चीनी मिल को क्षेत्र के लिए वरदान बताने लगे हैं। शनिवार को चीनी मिल परिसर में आयोजित उद्घाटन समारोह के दौरान जुटे दावेदारों ने भी अपना चुनावी दमखम दिखाने में कोई कमी नहीं छोड़ी।
इस मिल को जिले के करीब 40 हजार किसान गन्ने की आपूर्ति करते हैं। बीते एक दशक में चीनी मिल संचालकों ने भी खरीद का अपडेट भुगतान कर किसानों का भरोसा जीतते हुए विरोधियों का मुंह बंद किया है।
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आजादी के बाद कई दशक तक गोंडा में कोई चीनी मिल नहीं थी। केवल चबलरामपुर व तुलसीपुर में ही एक एक मिल संचालित थी। ऐसे में वर्ष 1995-96 में दल्ली के एक कार्पोरेट ग्रुप ने मैजापुर में चीनी मिल स्थापित की। तब बलरामपुर भी गोंडा जिले में ही आता था। चीनी मिल की स्थापना के दो वर्ष तक मिल ने खूब काम किया और कटरा के जो किसान गन्ने की खेती नहीं करते थे, वह भी गन्ना बुआई को मजबूर हो गए।
कटरा विधानसभा क्षेत्र में किसानों के लिए यह खुशहाली लेकर आई थी। लेकिन दो साल बाद ही मिथक टूटने लगा और 1998 में मिल ने किसानों का बकाया देना बंद कर दिया। मिल स्थापना के समय प्रदेश में बसपा-भाजपा की गठबंधन सरकार थी। कटरा बाजार में भाजपा से बावन सिंह विधायक थे।
मिल के विरोध में उस समय हलधरमऊ के ब्लाक प्रमुख रहे बैजनाथ दूबे ने किसानों के आंदोलन को धार दी। मिल के सामने किसानों का जमावड़ा लगने लगा और 1999 में चीनी मिल के चीनी स्टाक को प्रशासन ने जब्त कर लिया। प्रशासन ने मिल में डंप चीनी को बेंच कर किसानों का भुगतान किया। अंतत: मिल बंद हो गई । लेकिन इसका पूरा राजनीतिक फायदा बैजनाथ दूबे को मिला और वह कटरा बाजार से विधायक चुने गए।
किसान आंदोलन की अगुवाई करने पर सपा से बैजनाथ दूबे विधायक बने तो बावन सिंह को विधायक की कुर्सी गवांनी पड़ी। 2002 में बैजनाथ दूबे विधायक तो बन गए लेकिन प्रदेश में फिर बसपा की सरकार बनी लिहाजा वह भी किसानों की समस्या का समाधान नहीं करा पाए।
वर्ष 2007 में वह फिर विधायक बने और प्रदेश में सपा की सरकार भी बनी। लेकिन किसानों की समस्या खत्म न होने पर बावन सिंह ने मिल के सामने धरना दिया। किसान मुद्दे को मुखर रूप देते हुए बावन सिंह आगे बढ़ते रहे और 2012 में वह सपा के बैजनाथ दूबे को हराने में कामयाब रहे।
इसी दौरान वर्ष 2006-07 में मैजापुर चीनी मिल बिक गई और इसे बलरामपुर चीनी मिल यूनिट ने खरीद लिया। किसानों का भरोसा जीतने में मिल को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। वर्ष 2008-09 में किसान फिर से मैजापुर चीनी मिल से जुड़ने लगे। तब से मैजापुर चीनी मिल भुगतान को नियमित करते हुए किसानों का भरोसा जीतने में सफल रही।
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