गोंडा। जिले में बच्चों के कुपोषण की तस्वीर में बदलाव आया है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों में बौनापन कम हुआ है, लेकिन कम वजन और दुबलेपन की समस्या बढ़ गई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस)-5 और एनएफएचएस-6 के आंकड़ों में यह तस्वीर सामने आई है।
एनएफएचएस-5 में जिले के 45.9 प्रतिशत बच्चे उम्र के हिसाब से कम लंबाई वाले थे। एनएफएचएस-6 में यह आंकड़ा घटकर 27.7 प्रतिशत रह गया। यानी बौनेपन में 18.2 प्रतिशत कमी आई है। इसके विपरीत कम वजन वाले बच्चों का प्रतिशत 28 से बढ़कर 35.4 हो गया। अब पांच साल से कम उम्र के करीब हर तीन में से एक बच्चा कम वजन का है।
दुबलापन भी तेजी से बढ़ा है। एनएफएचएस-5 में 12.1 प्रतिशत बच्चे दुबले थे, जबकि एनएफएचएस-6 में यह आंकड़ा 22.1 प्रतिशत हो गया। गंभीर रूप से दुबले बच्चों की संख्या भी 3.8 से बढ़कर 5.4 प्रतिशत हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार बौनापन लंबे समय तक पोषण की कमी और बार-बार बीमारी से जुड़ा होता है, जबकि दुबलापन हाल में वजन तेजी से घटने या संक्रमण का संकेत हो सकता है।
खानपान में सुधार, फिर भी चुनौती बरकरार
सर्वे में बच्चों के खानपान से जुड़े कुछ संकेतक बेहतर हुए हैं। छह से 23 महीने के बच्चों में पर्याप्त आहार पाने वालों का प्रतिशत पांच से बढ़कर 27.4 हो गया। स्तनपान कराने वाली माताओं के बच्चों में यह आंकड़ा 5.8 से बढ़कर 28.2 प्रतिशत हुआ है। जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान कराने का प्रतिशत भी 17.9 से बढ़कर 38.8 हुआ है।
दस्त भी बढ़ा, पोषण पर असर
पांच साल से कम उम्र के बच्चों में दस्त की समस्या भी बढ़ी है। एनएफएचएस-5 में 15.4 प्रतिशत बच्चों में दस्त दर्ज हुआ था, जो एनएफएचएस-6 में बढ़कर 25.7 प्रतिशत हो गया। बार-बार दस्त होने से शरीर में पानी और पोषक तत्वों की कमी हो सकती है, जिससे बच्चे का वजन प्रभावित होता है। सांस संबंधी संक्रमण के लक्षण वाले बच्चों का प्रतिशत 11.2 से घटकर 1.6 हुआ है।
गर्भावस्था से ही शुरू होती है बच्चे की देखभाल
महिला अस्पताल की चिकित्साधिकारी डॉ. माधुरी त्रिपाठी ने बताया कि बच्चे के विकास की नींव गर्भावस्था से पड़ती है। गर्भवती महिला काे पर्याप्त और पौष्टिक आहार, संक्रमण से बचाव और प्रसव के बाद सही स्तनपान जरूरी है। शुरुआती छह महीने केवल मां का दूध और इसके बाद मां के दूध के साथ विविध पूरक आहार देना चाहिए। भोजन में दाल, हरी सब्जियां, फल, दूध-दही, अंडा या स्थानीय पौष्टिक खाद्य पदार्थ शामिल किए जा सकते हैं।
आईएमए के सदस्य और बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. घनश्याम गुप्ता का कहना है कि कुपोषण का मुकाबला केवल ज्यादा खाना खिलाकर नहीं किया जा सकता। बच्चे को उम्र के अनुसार संतुलित और विविध आहार, पर्याप्त स्तनपान, साफ पानी, स्वच्छता और समय पर इलाज मिलना जरूरी है।
सीएचसी खरगूपुर की अधीक्षक डॉ. श्वेता त्रिपाठी के अनुसार बच्चे का वजन और लंबाई नियमित रूप से देखनी चाहिए। वजन कम होने पर केवल भोजन बढ़ाने के बजाय बीमारी की जांच भी जरूरी है। साफ पानी, हाथ धोने की आदत और दस्त-बुखार का समय पर इलाज भी कुपोषण रोकने में मदद करता है।