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किताबों के दाम में महंगाई से अभिभावकों की फूल रही सांस

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फोटो-16-गोंडा के मालवीयनगर में दुकान से कॉपी-किताब खरीदते लोग। -संवाद - फोटो : GONDA
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गोंडा। जिले के निजी स्कूलों में फीस के साथ किताबों के दामों में बढ़ोत्तरी से अभिभावक परेशान हैं। पढ़ाई की फीस व डोनेशन जमा करने में अभिभावकों का सारा बजट बिगड़ गया है। अभिभावक कर्ज से बच्चों का दाखिला करवा रहे हैं। प्राइवेट स्कूलों द्वारा फीस के नाम पर किये जाने वाली मनमानी के खिलाफ शिक्षा विभाग की कुछ बोलने के बजाय मुंह बंद कर रखा है। प्राइवेट स्कूल संचालकों से कोई यह पूछने वाला नहीं कि आखिर किसके नाम पर इतनी भारी भरकम एडमीशन के नाम वसूली जा रही है। किताबों के दाम में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। स्कूलों में हर अभिभावकों के स्कूल में किसी न किसी मद के नाम पर पैसा वसूला जाता है। हर साल किताबों में बदलाव किये जाने से इसकी अलग महंगाई की मार झेलनी पड़ती है। ऐसा ही कुछ इस बार भी देखने को मिल रहा है।
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शहर के नामी गिरामी निजी व कॉन्वेंट स्कूलों में मनमानी हो रही है। एडमिशन फीस के साथ डोनेशन में बिल्डिंग, बिजली, पानी, पंखा, ड्रेस, किताब, जनरेटर के नाम पर अभिभावकों से भारी भरकम पैसे वसूले जा रहे है। हाईफाई स्कूलों में एडमीशन फीस दस हजार रुपये है वहीं छोटे स्कूलों में तीन हजार से पांच हजार तक है। इसके बाद हर माह की फीस अलग है। स्कूलों मे एनसीईआरटी की किताबों की जगह निजी प्रकाशकों की पुस्तकों को खरीदवा रहे हैं, जिसमें स्कूल प्रबंधन को अधिक कमीशन मिल रहा है। इस बार हर किताब पर पंद्रह से बीस फीसदी दाम बढ़े है।
किताबों के दाम छू रहे आसमान
निजी स्कूलों में पढ़ाना अब आसान नहीं दिख रहा है। दो साल कोरोना संक्रमण से ऑनलाइन शिक्षा देने में अभिभावकों को भी खर्च करना पड़ा अब कॉपी किताबों के दाम से वह टूट रहा है। शहर के डॉ. दिलीप शुक्ल बताते हैं कि अब कान्वेंट में पढ़ाई काफी महंगा पड़ रहा है। किताबों के दाम आसमान छू रहे हैं। प्रमोद श्रीवास्तव कहते हैं कि किताबों के दाम बीस फीसदी तक बढ़ गए हैं। स्कूल में प्रवेश कराने पर खर्च हो ही जा रहा है, अब किताबें भी महंगी है। पिछले साल की अपेक्षा इस बार कॉपियों के दाम 15 से 25 प्रतिशत बढ़े हैं, जबकि किताबों के दामों में भी 10 से 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
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स्कूलों में तय है कक्षावार किताबों का पैकेज
निजी स्कूलों ने कक्षावार किताबों का पैकेट तय कर रखा है। कक्षा एक से पांच तक की किताबों का पैकेज पांच हजार से सात हजार तक है। इसी तरह कक्षा आठ तक के किताबों का पैकेज आठ हजार तक पहुंच रहा है। कई नामी स्कूलों में दस हजार के करीब तक किताबों का खर्च आ रहा है। अब बच्चों को पढ़ाने की मजबूरी में किताबें लेना पड़ रहा है। जितेंद्र पांडेय कहते हैं कि किताबों के बिक्री में महंगाई आम आदमी की पहुंच से दूर है। इसी तरह राम बालक तिवारी भी कहते हैं कि शासन को इसके लिए भी नियम बनाने चाहिए। वहीं अलंकार सिंह कहते हैं कि किताबों-कॉपियों सहित अन्य सामग्री के दाम बढ़ते हैं, ऐसे में आम लोगों को बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाना मुश्किल हो गया है। लोगों को परेशानी उठानी पड़ रही है।
स्कूलों के प्रवेश पर नजर रखी जा रही है। लेकिन अभी शासन से कोई आदेश नही मिल है। सरकारी स्कूलों में फीस तय की गई है। कहीं से शिकायत मिलेगी, तो कार्रवाई की जाएगी। डॉ. अखिलेश प्रताप सिंह, बीएसए
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