गोंडा। अब जिला कारागार के साढ़े आठ सौ बंदी हुनरमंद बनकर कमाई करेंगे। बंदियों की रुचि के अनुसार जेल प्रशासन उन्हें दक्ष बनाएगा। इसके लिए स्वरोजगार से जुड़े संस्थानों से जेल प्रशासन ने संपर्क किया है। जेल प्रशासन के पास बंदियों को स्वरोजगार से जोड़ने के लिए बजट तो नहीं है। मगर संस्थाओं की मदद से बंदियों को हुनरमंद बनाने की तैयारी है। संस्थाओं की मदद से बंदियों को हुनरमंद बनाया जाएगा। जिससे बंदी जीविका चलाने के लिए कमाई करेंगे। बंदियों को हुनरमंद बनाने के लिए कारागार प्रशासन स्वयंसेवी संस्थाओं की तलाश कर रहा है। मगर उसे स्वयंसेवी संस्थाएं ढूंढे़ नहीं मिल रही हैं। यहां दो दर्जन से अधिक स्वंयसेवी संस्थाएं है। जिनपर सामाजिक कार्य करने की जिम्मेदारी है। मगर बंदियों को हुनरमंद बनाने के लिए एक भी संस्था अभी तक सामने नहीं आई है।
बंदियों को सिखाए जाएंगे ये हुनर
-महिला बंदियों को सिलाई, कढ़ाई
-पुरुष बंदियों को फाइल बनाना, कॉपी-किताबों समेत अन्य अभिलेखों की बाइंडिंग
तीन साल पहले 250 बंदियों को बनाया गया हुनरमंद
जिला कारागार में तीन साल पहले 250 बंदियों को हुनरमंद बनाया जा चुका है। इनमें से अधिकांश बंदी यहां प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद जेल से रिहा होकर अपना रोजगार कर रहे हैं। इनमें महिलाओं स्वयंसेेवी संस्था सवान कृपाल रुहानी मिशन की ओर से सिलाई कढ़ाई और पुरुष बंदियों को फाइल बनाने का प्रशिक्षण दिया गया था।
इलाहाबाद बैंक के केंद्र में प्रशिक्षण की व्यवस्था
विकास भवन परिसर में इलाहाबाद बैंक ने स्वरोजगारियों के लिए प्रशिक्षण देने की व्यवस्था कर रखी है। यहां आधा दर्जन से अधिक कुशल प्रशिक्षकों की तैनाती है। जो लोगों को स्वावलंबी बनाने का प्रशिक्षण देते हैं। बैँक स्वरोजगारियों के लिए ऋण भी उपलब्ध कराता है।
विभाग के पास है पर्याप्त बजट
सरकारी विभागों समेत अर्धसरकारी संस्थाओं के लोगों को स्वरोजगार से जोड़ने के लिए नगरीय विकास अभिकरण में पर्याप्त बजट है। विभागों के प्रोजेक्ट का अवलोकन करने के बाद प्रस्ताव पर बजट की स्वीकृति की जाती है। प्रोजेक्ट पर स्वयंसेेवी संस्थाओं के माध्यम से काम कराया जाता है। -विनोद कुमार सिंह, परियोजना अधिकारी, जिला नगरीय विकास अभिकरण
स्वयंसेवी संस्थाओं की तलाश
जिले में दो दर्जन से अधिक स्वयंसेवी संस्थाएं काम कर रही हैं। मगर कुछ संस्थाओं को छोड़कर कोई भी संस्था बंदियों को स्वावलंबी बनाने के लिए मददगार नहीं बन रही है। कई स्वयंसेवी संगठनों के पदाधिकारियों से संपर्क किया गया है। मगर उनके पास संसाधन के साथ ही प्रशिक्षक उपलब्ध नहीं है। इसलिए बंदियों के कल्याण के लिए ऐसी संस्थाएं आगे नहीं आ रही हैं। -शशिकांत सिंह, जेल अधीक्षक गोंडा।