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Ghazipur News: पीएचसी-सीएचसी में डॉक्टर नहीं, हर महीने 200 से ज्यादा मरीज जिला अस्पताल हो रहे रेफर

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जिले के सीएचसी और पीएचसी में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है। कई अस्पताल एक-दो डॉक्टरों के भरोसे चल रहे हैं। कहीं डॉक्टर के साथ फार्मासिस्ट, लैब टेक्नीशियन और वार्डबॉय तक नहीं हैं। विशेषज्ञ डॉक्टर न होने से मरीजों को जिला अस्पताल जाना पड़ता है। पीएचसी और सीएचसी से हर महीने 200 से ज्यादा मरीज जिला अस्पताल रेफर किए जा रहे हैं। जिला अस्पताल के आंकड़ों के अनुसार जिला अस्पताल में रोज 10 रेफरल केस आते हैं।
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शासन की ओर से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने और मरीजों को उनके घर के नजदीक इलाज उपलब्ध कराने का दावा किया जाता है। हकीकत में कहीं डॉक्टर हैं तो जांच की सुविधा नहीं, कहीं भवन है तो कर्मचारी नहीं। कहीं संसाधन है विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं। सबसे गंभीर स्थिति उन केंद्रों की है जहां चिकित्सकों की संख्या मरीजों के दबाव के मुकाबले बेहद कम है। डॉक्टरों पर ओपीडी के साथ इमरजेंसी, प्रसव, मेडिकोलीगल और अन्य जिम्मेदारियां भी रहती हैं। जिले में पांच सीएचसी और चार पीएचसी है।

गंभीर मरीजों को जिला अस्पताल ले जाने की सलाह देते हैं कर्मचारी
चहनिया में 50 बेड के अस्पताल का निर्माण अधूरा है। पुराने केंद्र पर पर्याप्त बेड और डॉक्टर नहीं होने से मरीजों को भर्ती करने की क्षमता सीमित है। गंभीर मरीजों के पहुंचने पर अस्पताल के कर्मचारी जिला अस्पताल जाने की सलाह देते हैं। ऐसे में दुर्घटना, गंभीर बीमारी या इमरजेंसी की स्थिति में मरीज को लोग जिला अस्पताल लेकर जाते हैं। कई ग्रामीण क्षेत्रों से जिला अस्पताल की दूरी 30 से 35 किलोमीटर तक है। कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर लैब टेक्नीशियन और फार्मासिस्ट की कमी है। जहां जांच के लिए मशीन या संसाधन उपलब्ध नहीं हैं, वहां मरीजों को निजी जांच केंद्रों का सहारा लेना पड़ता है। सोनबरसा अति प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में खून-पेशाब जैसी सामान्य जांच की सुविधा तक नहीं है।
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केस-1
शिकारगंज क्षेत्र के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर स्वास्थ्यकर्मियों की कमी बनी हुई है। रामपुर पीएचसी में चिकित्सकों के साथ अन्य स्वास्थ्यकर्मी तैनात हैं, लेकिन लैब टेक्नीशियन और वार्ड बॉय नहीं है। मुड़हुआ दक्षिणी पीएचसी में भी फार्मासिस्ट, लैब टेक्नीशियन और वार्ड बॉय की कमी है।

केस-2
टांडाकला के सोनबरसा अति प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में दोपहर एक बजे डॉक्टर की कुर्सी खाली मिली। मौजूद कर्मचारियों ने बताया कि डॉक्टर आए थे, लेकिन पोस्टमार्टम के लिए चले गए हैं। केंद्र पर प्रसव की सुविधा उपलब्ध है लेकिन सामान्य मरीजों की जांच के लिए जरूरी मशीनें नहीं हैं। खून-पेशाब जैसी जांच के लिए भी मरीजों को बाहर जाना पड़ता है।
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केस-3
चहनिया क्षेत्र में 50 बेड के नए अस्पताल का निर्माण शुरू हुआ, लेकिन वर्षों बाद भी इसका पूरा लाभ मरीजों को नहीं मिल सका है। पुराने केंद्र पर पर्याप्त डॉक्टर और मरीजों को भर्ती करने के लिए पर्याप्त बेड उपलब्ध नहीं हैं। गंभीर मरीजों को प्राथमिक उपचार के बाद करीब 35 किलोमीटर दूर जिला अस्पताल भेजना पड़ता है।

केस-4
नौगढ़ क्षेत्र के अमदहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की स्थिति खराब है। यहां चिकित्सकों के पद लंबे समय से खाली हैं। केंद्र दो स्टाफ नर्स तथा एक लैब टेक्नीशियन के भरोसे चल रहा है। डॉक्टरों की अनुपस्थिति में ग्रामीण मरीजों को उपचार के लिए दूसरे स्वास्थ्य केंद्रों की ओर जाना पड़ता है। दूरदराज के इलाकों से आने वाले मरीजों के लिए यह परेशानी और बढ़ जाती है। ग्रामीणों ने रिक्त पदों पर तत्काल डॉक्टरों की तैनाती की मांग की है।
केस-5
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सकलडीहा में हड्डी रोग विशेषज्ञ और सर्जन की तैनाती नहीं होने से मरीजों को इलाज के लिए अन्य अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है। वहीं गर्भवती महिलाओं को भी बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं और यहां सीजर की सुविधा उपलब्ध नहीं होने से उन्हें दूसरे अस्पतालों में जाना पड़ता है। यहां तैनात महिला चिकित्सक भी करीब चार महीने से नहीं हैं। चार फार्मासिस्ट के सापेक्ष केवल एक फार्मासिस्ट है। चार वार्डबॉय की जगह महज एक वार्डबॉय है। अधीक्षक डाॅ. बीके प्रसाद ने बताया कि चिकित्सक व कर्मचारी की कमी के बारे में उच्चाधिकारियों को अवगत कराया जा चुका है।
इनसेट

मरीज बढ़े, डॉक्टर घटे
सीएचसी और पीएचसी ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की पहली कड़ी हैं। यहां आने वाले मरीजों में बुखार, संक्रमण, चोट, प्रसव, पेट संबंधी बीमारी और अन्य सामान्य रोगों के मरीज शामिल होते हैं। इसके अलावा दुर्घटना और इमरजेंसी के मामले भी पहुंचते हैं। ऐसे में डॉक्टरों की पर्याप्त संख्या बेहद जरूरी है। लेकिन कई केंद्रों पर सीमित चिकित्सकों के कारण मरीजों का दबाव बढ़ने पर पूरी व्यवस्था प्रभावित होने लगती है। ग्रामीण अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी का असर गंभीर मरीजों पर पड़ रहा है। हड्डी, महिला रोग, बाल रोग, सर्जरी और अन्य विशेषज्ञता वाले मामलों में मरीजों को अक्सर उच्च स्वास्थ्य केंद्र भेजना पड़ता है। इससे ग्रामीणों को इलाज के लिए अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है।

गांव के स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर और जरूरी सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं। गंभीर बीमारी होने पर जिला अस्पताल जाना पड़ता है। गरीब परिवार के लिए आने-जाने और जांच का खर्च भी भारी पड़ता है। सरकार को सबसे पहले ग्रामीण अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी दूर करनी चाहिए।-विजय शंकर मौर्य, चहनिया

अस्पताल में डॉक्टर दिखाने के बाद जब जांच के लिए बाहर भेज दिया जाता है तो परेशानी और बढ़ जाती है। सरकारी अस्पताल में जांच की सुविधा और कर्मचारी उपलब्ध हों तो मरीजों को काफी राहत मिलेगी। गरीब लोगों को निजी जांच केंद्रों पर पैसा खर्च करना पड़ता है।मनीष तिवारी, बलुआ
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सामान्य बीमारी में तो किसी तरह काम चल जाता है, लेकिन रात में अचानक तबीयत बिगड़ जाए तो परेशानी होती है। स्वास्थ्य केंद्र पर पर्याप्त डॉक्टर और बेड नहीं होने के कारण मरीज को दूसरे अस्पताल ले जाना पड़ता है। प्रशासन को इमरजेंसी सेवाओं को मजबूत करना चाहिए।गुलशेर, विभूति नगर, चकिया

सिर्फ अस्पताल का भवन बना देने से स्वास्थ्य सुविधा बेहतर नहीं होगी। वहां डॉक्टर, फार्मासिस्ट, लैब टेक्नीशियन और वार्डबॉय भी पर्याप्त संख्या में होने चाहिए। जब कर्मचारी ही नहीं होंगे तो मशीनें और दूसरी सुविधाएं भी बेकार साबित होंगी।मुनीब अली,मुडहुआ दक्षिणी

कोट-
स्वास्थ्य कर्मियों की कमी को लेकर समय-समय पर उच्चाधिकारियों को पत्राचार कर अवगत कराया जाता है, ताकि रिक्त पदों पर तैनाती हो सके और मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें। डॉ. विकास सिन्हा, प्रभारी चिकित्साधिकारी
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जिले के स्वास्थ्य केंद्राें पर रिक्त पदों को लेकर शासन को पत्र लिखे गए हैं। इधर भी अवगत कराया है। - डॉ. पारितोष मिश्रा
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