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हाशिए के लोगों को मुख्य धारा में लाने के लिए आजीवन संघर्षरत रहे राजेंद्र यादव

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गाजीपुर। साहित्य में वर्चस्व की संस्कृति को तोड़कर नए लेखकों एवं विमर्श को स्थापित करने वाले हंस के यशस्वी संपादक एवं महत्वपूर्ण कथाकार राजेंद्र यादव की स्मृति में शुक्रवार को राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय में आयोजित विचार गोष्ठी में उन्हें हाशिए के लोगों को मुख्य धारा में लाने के लिए आजीवन संघर्षरत रहने वाला व्यक्तित्व बताय गया।
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डॉ. निरंजन कुमार यादव ने कहा कि राजेंद्र यादव पर संवाद कम विवाद अधिक हुए हैं। वह लोकतांत्रिक मूल्यों के हिमायती थे। हाशिए के लोगों को मुख्य धारा में लाने के लिए वह आजीवन संघर्षरत रहे।
उन्होंने कहा कि राजेंद्र जी दो बातों के लिए हमेशा हिंदी भाषा के इतिहास में याद किए जाएंगे। पहला उनके जैसा लोकतांत्रिक संपादक नहीं हुआ। दूसरा नए लेखकों को उन्होंने जगह दी। विभागाध्यक्ष डॉ. संगीता मौर्य ने अपने संस्मरण साझा करते हुए कहा कि राजेंद्रजी मान-अपमान से परे होकर साहित्य और समाज के लिए समर्पित रहे हैं। वह अपने परिवारजनों के आलोचना के शिकार थे लेकिन साहित्य जगत में उन्होंने बहुत कुछ नया किया और दिया है। हंस को पुन: प्रतिमान के रूप में स्थापित करना कम महत्वपूर्ण कार्य नहीं है। डॉ. शशिकला जायसवाल ने कहा कि सारा आकाश, लक्ष्मी जहां कैद है और छोटे ताजमहल उनकी महत्वपूर्ण कृतियां हैं। डॉ. अनीता कुमारी ने कहा कि वह आधुनिक स्त्रियों के रोल माडल थे। उन्होंने स्त्री जीवन के लिए जितना अकेले कार्य किया उतना किसी संस्थान ने नहीं किया है। कार्यक्रम का संचालन संयोजक डॉ. निरंजन कुमार यादव ने किया। इस अवसर पर डॉ. शैलेंद्र यादव, डॉ. विकास सिंह, डॉ. सारिका सिंह, डॉ. हरेंद्र कुमार, मीडिया प्रभारी डॉ. शिवकुमार आदि उपस्थित थे।
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