बदलते परिवश में गिल्ली-डंडा, कबड्डी, लट्टू, गुलेल, कितकित, चिप्पी डाड़ी, कंचे, लुकाछिपी एवं पतंगबाजी जैसे पारंपरिक खेल हम आप तो खूब जानते होंगे। लेकिन जरा घर के बच्चों से पूछिए तो इसके बारे में ...शायद ही वो बताए पाएं। नहीं ऐसी नहीं हैं गांव के बच्चे जरूर इससे पहचान रखते होंगे लेकिन शहरी इलाकों के बच्चों के लिए तो ये सिर्फ किसी और ही दुनिया के नाम होंगे। हां खेलों का नाम लेने पर वो आपके सामने मोबाइल दुनिया के न जाने कितने नाम गिना देंगे क्योंकि उनकी दुनिया तो स्मार्टफोन के इर्द गिर्द ही रह गई है। तो जाहिर है खेल भी उसी दुनिया के होंगे।
प्रत्येक वर्ष के श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नागपंचमी मनाई जाती है। इस बार यह दो अगस्त को पड़ रही है। सच कहा जाए तो बरसात मौसम का यह त्योहार हिंदी कैलेंडर के अनुसार पांचवें महीने में आता है। इसे पूजा पाठ के अलावा खेलकूद के लिए भी जाना जाता है। बल्कि यूं कहें कि पहले हर गांव में नागपंचमी का दंगल मशहूर होता था। इसमें बच्चे, बूढ़े और जवान सभी पूरे उत्साह से जोड़ी, गदा, नाल और डंबल फेरने की प्रतियोगिता में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे। बुजुर्गों की मानें तो ग्रामीण इलाकों में पंचमी के दिन कुश्ती, कबड्डी और कूड़ी कूद आदि का आयोजन बड़े उत्साहपूर्वक किया जाता था। उसकी तैयारी आषाढ़ु में शुरू हो जाती थी। लेकिन अब क्षेत्र के करमपुर, बहुरा और चिलौना कला आदि गांवों को छोड़ दिया जाए तो यह पूरी तरह अब रस्म अदायगी बनकर रह गया है। लोगों का कहना है कि इंटरनेट के इस दौर में शारीरिक विकास वाले खेलों के प्रति बच्चों का रुझान कम हो गया है।
खेलों के प्रति बच्चों का रूझान बढ़ा है। हमने इसे रोजी-रोटी से जोड़ दिया है। बच्चों ने हाकी-कुश्ती में कड़ी मेहनत की है। सफलता भी पाई है। पैसा और प्रसिद्धि क्या नहीं है खेल में। - इंद्रदेव
पहले के दिनों में पारंपरिक खेलों को शारीरिक-बौद्धिक विकास का साधन माना जाता था। आज तो आठ-दस वर्ष के बच्चों को पता ही नहीं है कि पारंपरिक खेल क्या होते हैं। - अरविंद कुशवाहा
क्रिकेट जैसे खेल का दबदबा बढ़ने से हाकी, खो-खो, कुश्ती एवं कबड्डी जैसे सस्ते और लोकप्रिय खेलों का महत्व कम होता जा रहा है। पारंपरिक खेलों में बच्चों का रुचि भी काफी कम हो गई है। - बेचू बिंद
पहले आषाढ़ की बारिश होते ही गांव-गांव अखाड़े तैयार किए जाते थे। बारिश के दिनों में मिट्टी भी मुलायम रहती है। इसलिए चोट लगने की संभावना भी काफी कम रहती थी। लोग प्रसन्न रहते थे। - जवाहिर मोदनवाल