अब स्कूलों में कार्यरत अध्यापकों एवं कर्मचारियों को बच्चों को अपमानित करना या शारीरिक दंड देना महंगा पड़ सकता है। इसके लिए विद्यालय में शिकायत पेटिका रखी जाएगी। इस पेटिका में बच्चे विद्यालय में अपने प्रति किए गए दुर्व्यवहार का लिखित शिकायती पत्र डाल सकेंगे। अभिभावक-शिक्षक समिति या ग्राम शिक्षा समिति शिकायतों की जांच कर संबंधित के खिलाफ कार्रवाई के लिए बेसिक शिक्षाधिकारी को प्रेषित करेगी।
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने स्कूलों में बच्चों को शारीरिक दंड दिए जाने को गंभीरता से लेते हुए बच्चों के प्रति असंवेदनशीलता एवं हिंसक संस्कृति का द्योतक माना है। इस संबंध में आयोग ने 6 अगस्त 2007 को निर्देश प्रत्येक राज्य के मुख्यमंत्रियों, जिलाधिकारियों एवं संबंधित शिक्षा विभाग को भेजा था। उनके निर्देश में सरकारी एवं गैर सरकारी दोनों तरह के स्कूलों में इसे लागू करने पर बल दिया गया था।
आयोग ने यह माना कि स्कूलों में बच्चों को अनुशासित करने के लिए शारीरिक दंड का प्रयोग किया जा रहा है जो बच्चों के मूलभूत मानव अधिकारों का उल्लंघन है। इससे पहले उच्चतम न्यायालय ने पहली दिसंबर 2000 को बच्चों के शारीरिक दंड पर प्रतिबंध लगाया था। इसे देखते हुए प्रदेश के प्रमुख सचिव की तरफ से शिक्षा निदेशकों को आदेश निर्गत किए गए थे। इस क्रम में निदेशक की ओर से सभी जिलाधिकारियों एवं बेसिक शिक्षाधिकारियों को फरमान जारी किया गया था। इस निर्देश में प्रत्येक विद्यालय में शिकायत पेटिका रखे जाने की व्यवस्था की गई लेकिन यह शिकायत पेटिका गिनती के विद्यालयों में ही कभी-कभार देखने को मिली। उसके बाद इसका पता नहीं चला।
नतीजा बच्चे अपनी शिकायत कभी नहीं कर सके। जिन गिनती के विद्यालयों में यह पेटिका मिली वहां पर शिक्षकों के डर की वजह से बच्चे उनकी शिकायत करने का साहस नहीं जुटा सके। इस तरह राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग का निर्देश बेअसर साबित हो रहा है।
शारीरिक दंड के रूप में बच्चों को फटकारना, परिसर में दौड़ाना, घुटने के बल बैठाना, छड़ी से पीटना, चिकोटी काटना, चांटा-तमाचा मारना, यौन शोषण, प्रताड़ना, बिजली का झटका देना, क्लासरूम में बंद कर देना, मेज पर खड़ा करना आदि कृत्य बच्चों को अपमानित करने की श्रेणी में आते हैं। इसे आयोग ने आपराधिक कृत्य माना है।
कई शिक्षकों की तरफ से आयोग के निर्देश की अनदेखी की जा रही है। विद्यालयों में बच्चों को मेज पर खड़ा करने के साथ ही छड़ी से पिटाई करने की कई घटनाएं सामने आई हैं। अभी भी स्कूलों में शिक्षक बच्चों को शारीरिक दंड देने से बाज नहीं आ रहे हैं।