थाना टूंडला क्षेत्र के ग्राम टूंडली में 34 वर्ष पूर्व 1992 में हुए बहुचर्चित बृजेश कुमारी दहेज हत्या कांड में बृहस्पतिवार को किशोर न्याय बोर्ड ने फैसला सुनाया। बोर्ड की प्रधान मजिस्ट्रेट अरोमा रमन पाइसेस तथा सदस्य विश्व विमोहन कुलश्रेष्ठ व संगीता पांडेय की पीठ ने साक्ष्यों के अभाव में आरोपी महिला (घटना के समय नाबालिग लड़की) को बाइज्जत बरी कर दिया है।
अदालती दस्तावेज के अनुसार, मृतका बृजेश कुमारी की शादी सुरेंद्र सिंह के साथ हुई थी। शादी के बाद से ही पति सुरेंद्र सिंह और ससुराल पक्ष के अन्य लोगों द्वारा दहेज में स्कूटर व अन्य सामान की मांग की जा रही थी, जिसके लिए बृजेश कुमारी का शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न किया जाता था। प्राथमिकी में आरोप था कि 20 अगस्त 1992 की सुबह करीब 3 बजे ससुरालियों ने दहेज की मांग पूरी न होने पर बृजेश कुमारी को पानी के कुएं में फेंक दिया, जिससे उसकी मौत हो गई । इस मामले में मृतका के परिवार की ओर से थाना टूंडला में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। पुलिस की घोर हीलाहवाली का आलम यह था कि वर्ष 1992 की इस वारदात की चार्जशीट पुलिस ने 18 साल बाद यानी 1 दिसंबर 2010 को किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष भेजी थी। चूंकि आरोपी महिला घटना के समय नाबालिग (बालिका अपचारी) थी, इसलिए उसकी फाइल को मुख्य केस से अलग कर बाल अदालत को ट्रांसफर किया गया था।
34 सालों में एक भी गवाह पेश नहीं कर पाई पुलिस
किशोर न्याय बोर्ड ने अपने 6 पेज के विस्तृत फैसले में पुलिस तंत्र पर बेहद तीखी और गंभीर टिप्पणियां की हैं। अदालत ने दर्ज किया कि केस दर्ज होने के बाद से अदालत के समक्ष एक भी गवाह या प्रलेखीय साक्ष्य पेश करने में पूरी तरह पुलिस नाकाम रही। बार-बार समय और सम्मन जारी होने के बाद भी जब कोई गवाह नहीं आया, तो कोर्ट ने 7 मई 2026 को साक्ष्य का अवसर समाप्त कर दिया था। कोर्ट ने फैसले में लिखा है कि वर्तमान में प्रौढ़ हो चुकी उस वक्त की बालिका अपचारी को सभी आरोपों से बरी किया जाता है।
सह-आरोपी 24 साल पहले ही हो चुके हैं दोषमुक्त
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि इस मामले के मुख्य सह-आरोपी कमलेश, शैलेंद्र बाबू उर्फ विजेंद्र और सुरेश को जिला एवं सत्र न्यायालय द्वारा 20 मार्च 2002 को ही संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त किया जा चुका था।