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पटाखों से दूर रहकर ही बचा लें पर्यावरण

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प्रदूषण का बढ़ता दायरा जिस तेजी से हवा में जहर घोल रहा है, उसे रोकने की सख्त जरूरत आन पड़ी है। विशेषज्ञों ने एनजीटी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि पेट्रोल व डीजल चलित वाहन से 58 प्रतिशत तक प्रदूषण का खतरा बढ़ता है। निर्माण कार्य और कार्बन आक्साइड उत्सर्जन से 27 प्रतिशत फिजां खराब होती है जबकि पटाखा से 15 फीसदी प्रदूषण का खतरा बढ़ता है। बेशक, हमारा डीजल, पेट्रोल, निर्माण कार्य और कार्बन उत्सर्जन से फैलने वाले प्रदूषण पर जोर नहीं है लेकिन पटाखों के इस्तेमाल से खराब होने वाली फिजां को तो बचाया जा सकता है। तो क्यों न यह काम हम और आप मिलकर इस दिवाली ऐसा प्रयास करें।
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अमर उजाला के एक युद्ध पटाखों के विरुद्ध अभियान से प्रेरित होकर हर वर्ग इस दीपावली को पटाखा रहित मनाने की जरूरत महसूस करने लगा है। डॉ. भीमराव अंबेडकर राजकीय महिला महाविद्यालय की छात्राओं ने इस मुहिम को वक्त की दरकार बताया। एनजीटी की रिपोर्ट पेश करते हुए 150 डेसिबल साउंउ के बीच रहने से दिल की धड़कन बढ़ने की बात कही। 130 से 135 डेसिबल की आवाज दर्द, घबराहट, उल्टी का कारक है। खुलासा किया कि सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक शहरी इलाके में दिन में 55 डेसिबल व रात में 45 डेसिबल तक शोर होना चाहिए। इसके उलट अगर जमीनी हकीकत पर गौर फरमाएं तो डेसिबल का दायरा काफी है।
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बोले विद्यार्थी-
फोटो संख्या-17
पटाखों से दूर रखेंगे रोशनी के त्योहार को
पटाखे के इस्तेमाल से केवल पर्यावरण को ही नुकसान नहीं होता है बल्कि आतिशबाजी के घातक रसायन की वजह से शरीर पर विपरीत असर पड़ता है। ऐसे में अब समय आ गया है कि रोशनी के इस त्योहार को पटाखों की धमाचौकड़ी से महफूज रखा जाए।
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- कोमल, तृतीय वर्ष, डॉ. भीमराव अंबेडकर राजकीय महिला महाविद्यालय
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फोटो संख्या-18
पौध रोपकर मनाएंगे हरित दीपावली
कोरोना महामारी में अपनी सेहत की हर किसी को फिक्र है। पटाखा से फैलने वाले प्रदूषण से पर्यावरण को तगड़ा नुकसान हो रहा है। क्षणिक मौज के लिए समाज को खतरे में डालना ठीक नहीं है। इस दीपावली को हरित दीपावली बनाने के लिए पौधरोपण करेंगे।
- प्रियांशी, बीए द्वितीय वर्ष, डॉ. भीमराव अंबेडकर राजकीय महिला महाविद्यालय
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फोटो संख्या-19
ज्ञान का प्रकाश फैलाएं, न कि पटाखा जलाएं
लंबे समय से दीपावली में आतिशबाजी करने की रवायत है। पटाखा का बेतहाशा इस्तेमाल होने से जीवन खतरे में पड़ जाता है। इंसान से लेकर पशु पक्षी पर इसका विपरीत असर पड़ता है। हम संकल्प लें कि ज्ञान का प्रकाश फैलाने का न कि पटाखा जलाने का।
- कोमल, बीए द्वितीय वर्ष, डॉ. भीमराव अंबेडकर राजकीय महिला महाविद्यालय
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फोटो संख्या-20
पटाखा की रकम से जरूरतमंद को खरीदेंगे किताबें
पटाखा का प्रयोग होने से कार्बन डाईआक्साइड फिजा में घुलती है। कई तरह की हानिकारक बीमारियां फैलती हैं। ऐसे में पटाखा जलाकर खुशियां मनाने का कोई औचित्य नहीं। पटाखा खरीदने के बजाय इस त्योहार जरूरतमंदों को किताब खरीद कर देंगे।
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- अंशिका मौर्या, बीए प्रथम वर्ष, डॉ. भीमराव अंबेडकर राजकीय महिला महाविद्यालय
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