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कुख्यातों के बीच जेल में सजा नौनिहालों के शिक्षा का मंदिर

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फतेहपुर। हत्या, लूट, डकैती, दुष्कर्म जैसे अपराधों को अंजाम देने वाले अपराधियों के बीच जिला कारागार में नौनिहालों के लिए शिक्षा का मंदिर भी संचालित हो रहा है।
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मां के साथ जेल में बंद बच्चे जब बाहर की दुनिया में पहुंचे, तो वह अशिक्षा से हीन-भावना का शिकार न हो, इसके लिए जेल प्रशासन ने अनूठी पहल की है। बच्चों को देश की संस्कृति और सभ्यता के बारे में जानकारी दी जा रही है।
जेल का नाम सुनते ही लोगों में नकारात्मक विचार पैदा हो जाते हैं। अपराधियों के ठिकाने की वजह से जेल का जीवन बेहद खराब माना जाता है। अब जेल का माहौल बदलने के प्रयास होते दिख रहे हैं। इस बदलाव की बयार में जिला कारागार में कई नई तस्वीरें दिखाई देती हैं।
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आपराधिक मामलों में कई बार महिलाओं के साथ उनके छह साल तक के बच्चे भी रहते हैं। क्योंकि बाहर उनकी कोई देेखभाल करने वाला नहीं होता है। ऐसे में मासूम बचपन भी जेल में कटता है।
बाहर के बच्चों की तरह वह खेलकूद और पढ़ाई नहीं कर पाते हैं। कारागार प्रशासन ने अब बच्चों की मासूमियत को बचाने को लिए उन्हें घरेलू माहौल देने का प्रयास शुरू किया है।
जिससे बेहतर शिक्षा और पालन पोषण हो सके। जेल में कुल 80 महिला बंदी हैं। इनमें 17 महिलाओं के 18 बच्चे हैं। इनमें स्कूल नहीं जा पाने वाले छोटे बच्चों के लिए परिसर में आंगनबाड़ी केंद्र खोला गया है। जहां बच्चे शुरूआती शिक्षा ग्रहण करते हैं। बच्चों को शारीरिक और मानसिक रुप से दुरुस्त रखने के लिए शानदार चिल्ड्रेन पार्क भी बनाया गया है।
चार बच्चे स्कूल पढ़ने जाते
आम तौर पर जिस तरह से बच्चे घरों से पढ़ने के लिए स्कूल जाते हैं। उसी तरह से जेल से भी हत्या और डकैती जैसे अपराधों को अंजाम देने वाली महिला बंदियों के बच्चों को भी पढ़ने के लिए शहर के ट्रुथ मिशन स्कूल भेजा जा रहा है। स्कूल की बस जेल गेट पर आती है तो बच्चे घर की तरह भागकर पहुंच जाते हैं। जेल प्रशासन की सुरक्षा के बीच बच्चे स्कूल से आते-जाते हैं।
माहौल से महिला बंदी खुश
किस मां की ख्वाहिश नहीं होती कि उनका लाडला तरक्की करे। जिला कारागार में बच्चों की देखभाल से महिला बंदी तनावमुक्त रहती है। विभन्न संस्थाओं के लोग भी खिलौने, कपड़े, फल समेत अन्य खाने पीने की पौष्टिक सामानों का इंतजाम करते हैं। आंगनबाड़ी में प्रतिदिन पौष्टिक आहार दिया जाता है।
जिला कारागार में मां के साथ बंद बच्चों को घरेलू माहौल देने का पूरा प्रयास किया जा रहा है। जब वे जेल से बाहर जाए तो वह समाज के साथ कदम-कदम मिलाकर चल सकें। बच्चों के मनोरंजन, प्रतियोगिताओं और त्योहार पर कार्यक्रम कराए जाते हैं। जिससे संस्कृति का ज्ञान हो सके। जेल प्रशासन को कई समाजसेवी संस्थाओं का भी सहयोग मिलता है। - मोहम्मद अकरम खान, जेल अधीक्षक
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