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प्रदूषण से पर्यावरण का सीना छलनी नहीं होने देंगे

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फतेहपुर। दीपावली में पटाखों के बेतहाशा इस्तेमाल से पैदा होने वाले प्रदूषण से पर्यावरण का सीना छलनी होता है। क्षणिक खुशी के लिए की जाने वाली आतिशबाजी से उत्पन्न होने वाली वायु व ध्वनि प्रदूषण की समस्या का दंश लंबे समय तक आवाम को भुगतना पड़ता है।
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दोआबा को रोशनी के त्योहार में धुएं और शोर से बचाने की जिम्मेदारी समाज महसूस करने लगा है। यही वजह है कि बगैर आतिशबाजी के दीपावली मनाने का संकल्प लिया जाने लगा है। सबका मानना है कि पर्यावरण को बचाने के लिए आज और अभी से काम करना होगा।
यह तभी संभव होगा जब यह दीपावली, पटाखों के धूम-धड़ाकों से परे मनाई जाएगी। तो देर किस बात की, आप भी हरित दीपावली को तैयार हो जाइए। आखिर पर्यावरण की रक्षा हम सभी का फर्ज है। अमर उजाला के एक युद्ध पटाखों के विरुद्ध की मुहिम को कारवां मिल रहा है।
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इस मुहिम का भागीदार बनने के लिए लोग खुद से सामने आने लगे हैं। स्वयंसेवी संस्थाओं ने इस अभियान का इस्तबाल करते हुए इसे समय की दरकार बताया। कहा कि बेशक, बच्चे नहीं मानते लेकिन उन्हें मनाने का काम भी अभिभावकों को ही करना है। स्वयंसेवी संस्थाओं का कहना है कि पटाखा मुक्त दीपावली का संदेश देने का काम किया जाएगा।
आतिशबाजी से पर्यावरण में घुलने वाले जहर को रोकने की जिम्मेदारी सभी को निभानी होगी। अभी नहीं तो कभी नहीं। इस थीम पर काम करना होगा। पटाखे पर खर्च की जाने वाली अनाप-शनाप रकम बचाकर हम पर्यावरण पर बढ़ते खतरे को टालने का काम कर सकते हैं। - आलोक गौड़, प्रवक्ता, युवा विकास समिति
बेशक, दीपावली का रोशनी से सीधा संबंध है। घरों में रोशनी करने के साथ आतिशबाजी की जाती है लेकिन आज आतिशबाजी का स्कोप बढ़ गया है। या यह कह लें कि यह रिवाज अब प्रतिस्पर्धा से तब्दील हो गया है। ऐसे में पर्यावरण से खिलवाड़ बंद करने की घड़ी आ गई है। - राजेंद्र साहू, अध्यक्ष, नेहरू युवा संगठन टीसी
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