फर्रुखाबाद। करीब 300 साल का सफर पूरा करते हुए छोटी काशी की सांस्कृतिक
विरासत छटपटा रहा है। यहां के मंदिरों, ऐतिहासिक इमारतों पर बदलाव का ग्रहण
साफ दिखाई पड़ रहा है। हालत यह है कि जिन मंदिरों में घंटे घड़ियाल की
गूंज सुनाई पड़ती है, उनका नामलेवा नाममात्र के लोग बचे हैं।
फर्रुखाबाद
के नामकरण को 300 साल पूरे हो रहे हैं। 27 दिसंबर को स्थापना का 301वां
साल लग जाएगा। नवाब मोहम्मद खां बंगश ने बमटेला गांव की भूमि पर 27 दिसंबर
1714 को शहर की स्थापना कर इसे फर्रुखाबाद नाम दिया था। इन तीन सौ साल में
बहुत कुछ बदला। इस बदलाव में सबसे ज्यादा दुर्दशा विरासताें की हुई। छोटी
काशी कहे जाने वाले फर्रुखाबाद में सालाें पहले बने मंदिराें का वजूद खत्म
होने लगा है।
माधौपुर इलाके में 101 शिवमंदिर है, लेकिन अब इन मंदिरों के
बारे में इलाके के लोग भी ज्यादा नहीं बता पाते हैं। इनका वास्तु लाजवाब
है। देखरेख न होने से इस विरासत पर जो आफत आई तो फिर वह टली नहीं। माधौपुर
में ही लक्ष्मण गढ़ी में स्थापित लक्ष्मण की मूर्ति में हीरे की आंखें थीं।
इन्हें निकाल लिया गया। पांडवेश्वरनाथ मंदिर में शिवलिंग की स्थापना
पांडवों ने की है। गुरुगांव के काली देवी मंदिर में भीम गदा रखे होने की
मान्यता है। इन्हें भी संरक्षित करने की कोई कोशिश नहीं है। अभी इन
विरासताें को बचाने की कोई पैरवी न हुई तो यह अतीत के अंधेरे में गुम हो
जाएंगी।
कबाड़ घर बन गए सालों पुराने मंदिर
शहर की मंदिराें की
शानदार विरासत कबाड़ में तब्दील हो गई है। इनमें कहीं कंडे भर दिए गए तो
कहीं इनमें पुआल के ढेर लगे हैं। मंदिराें की जमीन पर कब्जे हैं। बरसों
पहले बने मंदिर अब खंडहर हालत में हैं। ऐसा इन विरासताें की उपेक्षा से
हुआ।
अभी भी इन विरासताें को संजोया जाए तो यह आस्था व पर्यटन के बड़े
केंद्र साबित हो सकते हैं। साहबगंज से माधौपुर इलाके में 101 मंदिरों का
निर्माण कराया गया था। इनमें पत्थराें की जुड़ाई चूना व राख से है। इन सभी
मंदिराें की डिजायन, आकार व आकृति एक सी है।
मंदिराें के अंदर व बाहर पत्थर
पर महीन नक्काशी की गई है। इन पर धार्मिक किवदंतियाें व कहानियाें को
करीने से उकेरा गया है। महीन बेलबूटे उकेरे गए हैं। कई मंदिरों का शिल्प,
नक्काशी व डिजायन दक्षिण भारत की शैली को भी मात करती है। नक्काशी के अलावा
प्राकृतिक रंगाें से इन पर पेंट किया गया है। यह रंग धुंधले पड़ने लगे हैं
लेकिन कशिश अभी भी बरकरार है।
इन मंदिराें का अस्तित्व मिटने लगा है।
इनक ी दीवारें ध्वस्त और बुर्ज गिर गए हैं। आसपास गंदगी है। मूर्तियां गायब
कर दी गई हैं। इनमें गहरे नीले रंग के पत्थर के शिवलिंग स्थापित थे।
मंदिराें पर लोगाें ने कब्जा जमा लिया है।
इनमें कंडे, पुआल व कबाड़ भर
दिया कई मंदिर पूरी तरह खत्म हो गए हैं। इन मंदिराें की उम्र 150 से 200
साल के बीच है। इन्हें बचाने के लिए न तो प्रशासन ने कोई पहल की और न ही
सियासी नुमाइंदाें ने। इससे यह बेमिसाल विरासत मिटने की ओर है।
मोहित करती कला
नीवलपुर
में शिव मंदिर 1931 संवत् का बना है। यह कसीदाकारी का बेहतरीन नमूना है।
पत्थर पर चित्र और मूर्तियां उकेरी गई हैं। समुद्र मंथन की कलाकृतियां
विस्मित करती हैं। मंदिराें के दरवाजाें पर भी नक्काशी है। नंदी मंदिर में
नंदी की भारी भरकम मूर्ति है। नंदी के ऐसे मंदिर बहुत कम हैं। मंदिर के
अंदर राजा भतृहरि, हरिश्चंद्र, भागीरथ की पेंटिंग इसे और खास बनाती हैं।
स्थापना का इतिहास
सन्
1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके बेटों में सिंहासन के लिए युद्ध
होने लगा। आखिर में जहांदारशाह ने दिल्ली सिंहासन हासिल किया। फर्रुखसियर
ने अपनी दावेदारी रख दी। सन् 1712 में बहादुरशाह की मृत्यु केे बाद
फर्रुखसियर का जहांदारशाह से दिल्ली के सिंहासन के लिए युद्ध हुआ।
कायमगंज
के गांव मऊ रसीदाबाद में 1665 में पैदा हुए अफगान सरदार मोहम्मद खां बंगश
ने 11000 सैनिकों के साथ फर्रुखसियर को फतह दिलवाई। फर्रुखसियर ने मोहम्मद
खां बंगश को नवाब की पदवी दे दी। पुरस्कार में बुंदेलखंड और कन्नौज की
जागीरें सौंपी।
मोहम्मद खां बंगश वापस इलाके में लौट आया। उसने फर्रुखसियर
के नाम पर फर्रुखाबाद बसाने का ऐलान कर दिया। इसके बाद 27 दिसंबर 1714 को
फर्रुखाबाद का नामकरण किया।