यूरो की मंदी में टेक्सटाइल प्रिंट कारोबार डूबा रहा है। तीन माह से
कारोबारी मुश्किल में हैं। यूरो 80 रुपये से टूटकर 67 रुपये के करीब ठहरा
है। यूरोप के देशों क ो यहां के कारोबारी 60 से 70 फीसदी आइटम निर्यात
करते हैं। यूरो पर मंदी से लागत बढ़ गई है। इस पर खरीदार माल लेने के लिए
तैयार नहीं हैं। पुराना माल डंप पड़ा है। इससे निर्यात कारोबार 30
से 40
फीसदी ही रह गया है। टेक्सटाइल प्रिंट कारोबार 500 करोड़ सालाना का है।
मंदी से इस बार कारोबार को तगड़ी चोट पहुंचने की आशंका है। पिछले तीन माह
से यूरो पर मंदी छाई है। इसकी कीमत 80 से 67 रुपये आ गई है। इसके चलते
प्रिंट आइटमों पर लागत बढ़ गई है। यह सवा गुना हुई है। खरीदार यह कीमत देने
के लिए तैयार नहीं हैं। वह पुरानी
कीमत पर ही माल चाह रहे हैं। इससे माल
डंप हो गया है। कारोबारी रोज एक से सवा लाख मीटर कपड़े पर छपाई करते हैं।
एक से डेढ़ करोड़ रुपये की कीमत का माल तैयार होता है। यूरोपीय देशों में
निर्यात रुकने से कारोबार सिमट कर 30 से 40 फीसदी रह गया है। इससे छपाई
ब्रेक कर दी गई है। यूरो के हालत न सुधरने तक मजदूरों की छंटनी की भी
तैयारी
चल रही है। घरेलू बाजार में निर्यात की गुणवत्ता के मुताबिक कीमत
नहीं मिलती है। ऐसे में बाकी देशों में निर्यात की संभावनाएं भी तलाशी
गईं। यूरो की मंदी का असर बाकी देशों पर भी होने से कारोबारी निराश होने
लगे हैं।
शहर में 225 इकाइयां टेक्सटाइल प्रिंट कारोबार करती हैं।
इनमें से 12 इकाइयां सीधे निर्यात में लगी हैं। कारोबारी छापे के
परदे,
हैंड कुल्टिड बेड कवर कम रजाई, स्टोल, स्कार्फ, शाल व साड़ियां निर्यात
करते हैं। निर्यात कारोबार जर्मनी, बेल्जियम, बिट्रेन, अमेरिका, इटली,
पाकिस्तान, ईरान, ईराक, दुबई, अफ्रीका, इजरायल, हंगरी, टर्की, रूस देशों
में है। यूरोपीय देशों में प्रिंट आइटमों की 60 से 70 फीसदी खपत है। सबसे
ज्यादा कारोबार स्कार्फ व स्टोल से हो रहा है। इनका सालाना निर्यात
400
करोड़ का है। रजाई का विदेशी कारोबार 40 से 50 करोड़ का है। साड़ियां, शाल,
इंब्रायडरी, ड्रेस मैटेरियल की हिस्सेदारी 50 करोड़ की है। इंडियन
इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के फर्रुखाबाद चैप्टर चेयरमैन रोहित गोयल बताते हैं कि
यूरो क ी कीमत गिरने से टेक्सटाइल प्रिंट इंडस्ट्री बुरे दौर में आ गई है।
यूरोपीय देशों को 60 से 70 फीसदी निर्यात होता है। यह रुक गया
है। रोहित
कहते हैं कि ऐसी नौबत कई साल बाद बनी है। यूरो क ी कीमत चढ़ गई तो भी इस
मंदी से उबरने में वक्त लग जाएगा। कुल मिलाकर इन हालातों से कारोबारियों के
साथ कामगार भी परेशान हैं। कामगारों की परेशानी है कि अगर छटनी हो गई तो
उनकी रोजी रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा।