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नौकरी के लिए फर्जी अभिलेख लगाने में सात साल की सजा

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मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट राजेंद्र कुमार सिंह ने गुरुवार को धोखाधड़ी व जालसाजी के मुकदमे में सात साल की सजा सुनाई है। साथ ही छह हजार रुपये जुर्माना भी किया है। जुर्माना अदा न करने पर तीन माह की अतिरिक्त सजा भुगतनी होगी।
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साल 1991 में डाक सहायक पद की नियुक्तियां निकली थीं। इसमें औरैया जिले के थाना फफूंद के गांव पुरवा उदई निवासी गंगा प्रसाद ने आवेदन किया था। उन्होंने उत्तर माध्यमा परीक्षा 1986 व शास्त्री परीक्षा 1988 के अंक पत्र संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी के लगाए थे। इन अभिलेखों की विश्वविद्यालय से जांच कराई गई।
27 दिसंबर 1992 में कुल सचिव (परीक्षा) संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी ने सत्यापन रिपोर्ट दी। इसमें गंगा प्रसाद द्वारा लगाए गए शैक्षिक अभिलेख विश्वविद्यालय से जारी होना नहीं बताए गए।
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डाक अधीक्षक फतेहगढ़ आरएस दोहरे ने गंगा प्रसाद के खिलाफ वर्ष 1993 में शहर कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। इसमें नौकरी पाने को धोखाधड़ी व जालसाजी कर फर्जी शैक्षिक अभिलेख लगाने का आरोप लगाया था।
विवेचक ने जांच कर अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया। मुकदमे की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील व अभियोजन अधिकारी लक्ष्मीराज सिंह ने दलीलें पेश कीं। सुनवाई के बाद सीजेएम ने आरोपी को दोषी पाकर सजा व जुर्माने से दंडित किया है। जेल मेें बिताई अवधि सजा में समायोजित करने का भी आदेश दिया है।
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