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Farrukhabad News: आस्ट्रेलियन केंचुओं से खाद बनाकर पिंकी ने पकड़ी कमाई की राह

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फोटो-14 जैविक खाद तैयार करते समय आस्ट्रेलियन केंचुआ दिखातीं पिंकी राजपूत। संवाद
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फर्रुखाबाद/कमालगंज। बिचपुरी की पिंकी राजपूत ने जैविक खाद तैयार कर स्वावलंबन के साथ ही रासायनिक खादों से होने वाले नुकसान से बचने का बीड़ा उठाया है। उन्होंने गोबर में सबसे अधिक क्रियाशील रहने वाले आस्ट्रेलियन केंचुओं से जैविक खाद तैयार की है। सौ बोरी खाद की बिक्री हो चुकी है, नए आर्डर भी मिल रहे हैं।
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बिचपुरी की पिंकी राजपूत 2023 में आजीविका मिशन से जुड़ीं। अब वह गंगा महिला स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष हैं। पहले उन्होंने मशरूम की खेती का विचार बनाया। तलाश के बाद भी उचित जमीन नहीं मिल पाई। इस बीच रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग को देख मन में जैविक खाद बनाने का विचार आया। विज्ञान से परास्नातक पति शुभम राजपूत से चर्चा की तो जैविक खाद तैयार करने के काम की नींव पड़ गई। चार माह पहले काम शुरू किया तो अब तक डेढ़ सौ बोरी खाद तैयार हो चुकी है।

राजस्थान से आते हैं आस्ट्रेलियन केंचुए :
पिंकी ने बताया कि स्थानीय केंचुआ मिट्टी खाता है, यह गोबर में अपेक्षाकृत कम सक्रिय रहता है। जबकि आस्ट्रेलियन केंचुआ गोबर में सबसे ज्यादा क्रियाशील रहता है, इसीलिए आस्ट्रेलियन केंचुआ से जैविक खाद बनाई जा रही है। यह राजस्थान से मंगाए जाते हैं। 35 से 40 दिन में जैविक खाद तैयार होती है।
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नीम व सरसों की खल तथा ट्राइकोडर्मा भी डाला जाता
- जैविक खाद की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए नीम की खल मिलाई जाती है। सरसों की खल भी डाली जाती है। इससे पौधों की जड़ों में दीमक व फंगस आदि से बचाव होता है। जड़ों को सड़ने से बचाने के लिए ट्राइकोडर्मा भी डाला जाता है।

पिंकी ने बताया तीन फीट चौड़ाई व 20 मीटर लंबाई में मोटी प्लास्टिक बिछाकर बेड तैयार किया जाता है। उस पर चार फीट ऊंचाई में गोबर बिछाया जाता है। एक बेड में एक टन गोबर आता है। 45 से 50 डिग्री तापमान से जब 15-20 दिन में गोबर ठंडा होकर 25 डिग्री पर आ जाता है तो 20 से 25 किलो केंचुआ डाले जाते हैं। गोबर सड़ता जाएगा, ऊंचाई कम होती जाएगी। केंचुआ गोबर खाएगा, ऊपर अपना अपशिष्ट छोड़ेगा। उसे झाड़ू या हाथों से एकत्र कर चलनी से छान लिया जाता है। कुल पांच लाख लागत आई। 50 किलो जैविक खाद की बोरी फुटकर में 500 व थोक में 450 की बिक रही है।
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