फर्रुखाबाद। गम के महीने मोहर्रम में हरी भरी घास से तैयार हालों का ताजिया अपनी सुंदरता बिखेरने लगा है। इसे देखने वालों का तांता लगा हुआ है। मोहर्रम की पहली तारीख से सजने वाले ताजियों को इमाम हुसैन की याद में कर्बला में दफन किया जाएगा।
मशीनी युग में भी ताजिया हाथों की कारीगरी से ही बनाए जाते हैं। यूं तो कई तरह के ताजिया बनते हैं। इन्हें बनाने में कारीगरों में हुनर नजर आता है। मगर सबसे अधिक आकर्षण हरी भरी घास से बना हालों का ताजिया होता है। मोहल्ला हाता मंझले खां भीकमपुरा निवासी दिलशाद खां ने बताया कि हालों का बीज आता है। पहले तैयार किए गए ताजिया के ऊपर इन्हें कारीगरी से लगाया जाता है। हर रोज समय पर पानी दिया जाता। दादा यार मोहम्मद, पिता लाल मोहम्मद और अब वह इसे बनाते हैं। करीब 90 सालों से हालों का ताजिया उनके परिवार में बन रहा है।
दिलशाद बताते हैं कि पहले बांस की मदद से ढांचा तैयार करते हैं। इसके बाद खजूर की पत्तों से बनी चटाई और उसके ऊपर रुई सिलने करके पानी से पूरा भिगो देते हैं। इसके बाद मोहर्रम की तीन तारीख को इसमें हालों के बीज करीने से लगाए जाते हैं। लगातार पानी डाला जाता है। दिलशाद ने बताया कि इसके बनाने में 40-50 हजार रुपये लागत आती है। हम किसी से चंदा नहीं लेते। अपना परिवार मदद करता है।
ईंट, सीमेंट व मौरंग के ताजिया में शानदार हुनर
शहर के मोहल्ला सूफी खां में राजमिस्त्री का ताजिया बनता है। इसको ईंट, सीमेंट और मौरंग से शानदार कला का प्रदर्शन कर बनाया जाता है। बहीदउल्लाह बताते हैं कि यह 70-80 साल से बना रहे हैं। हमारे पिता हबीबुल्ला, भाई हबीमुल्ला और अब वह बना रहे हैं। इसे कर्बला नहीं ले जाते हैं।