‘गंगा को अविरल और निर्मल बनाने के लिए बुधवार को कैबिनेट की बैठक में
नमामि गंगे कार्ययोजना को मंजूरी मिल गई है। इसके तहत गंगा स्वच्छता के
लिए अगले पांच साल में 20 हजार करोड़ रुपये खर्च होंगे। कार्ययोजना के तहत
आवंटित ये भारीभरकम रकम पिछले तीस सालों में विभिन्न सरकारों की ओर से खर्च
की गई चार हजार करोड़ की राशि से पांच
गुना है। तब भी गंगा की स्वच्छता के
लिए पैसा खर्च हुआ है लेकिन इससे हुए काम यहां दिखाई कहीं नहीं देते हैं।
गंगा की बीमारी बढ़ रही है लेकिन इसे बचाने के लिए जमीन पर कुछ भी नहीं
हुआ। शनिवार को अमर उजाला ने पंचाल घाट पर गंगा का दर्द महसूस किया। यहां
गंगा की कराह थी, अपनों से नाराजगी लेकिन मरहम की उम्मीद दूर-दूर तक नजर
नहीं आई। यूं पहले की तरह मरहम कागजों पर ही लगता रहा तो गंगा की बीमारी
लाइलाज हो सकती है।’
पांचाल घाट पर गंगा के किनारे दायीं ओर बस्ती है। यहां का गंदा पानी सीधे
गंगा में जाता है। मेला रामनगरिया के दौरान हर साल जनवरी व फरवरी में इस
पानी को रोकने के लिए सरक ारी ड्रामा होता है। कच्ची नाली के मुहाने पर
मिट्टी से फौरी बंधा बना दिया जाता है। पानी तब भी रिस कर गंगा में जाता
रहता है।
शनिवार को बस्ती का पानी गंगा में जा रहा था। इसमें डिटरजेंट
और शौचालयों का भी पानी था। इसी के पास में गंगा के
किनारे कपड़े धोए जा
रहे थे। इसके लिए मनाही है। कपड़े धो रही महिला नाम तो बताने सेे परहेज
करती हैं लेकिन इतना बता देती हैं कि किसी ने कभी रोका नहीं। इनसे बात करने
के दौरान ही पानी में तेज हलचल होती है। नजर घुमाने पर भैंसों का झुंड
गंगा में उतरता दिखता है। चरवाहे इन्हें हांकते हैं तो यह तेजी से तैरने
लगती हैं। घाट पर मौजूद राकेेश बताते हैं कि सोताबहादुरपुर अमेठी जदीद के
चरवाहे हैं। यह इनका रोज का काम है। कोई रोक टोक नहीं है।
पुल पार कर
स्नानघाट पर पहुंचने पर गंदगी से साबका पड़ता है। गंगा में स्नान कर पुण्य
कमाने आए लोग गंगा की बीमारी बढ़ाने का इंतजाम कर गए हैं। यहां टूटी
मूर्तियां, पालीथिन पड़ी थीं। दूसरी ओर शमशान घाट है। यहां पांच
अंत्येष्टि हो रही हैं। एक अंत्येेष्टि पूरी होते ही बचा हुआ कोयला, राख
गंगा के सुपुर्द की जाने लगती है। किसी को भी कोई डर नहीं है। यहां से
भैरोंघाट की ओर जाने के लिए का रास्ता पकड़ते हैं। यहां भी नालों और छपाई
कारखानों का पानी रोेकने के
लिए बंधा बना था। इसके बंध टूटे महीनों हो गए।
गंदा पानी गंगा में गिरता मिला। वापसी के लिए भैरोंघाट से अमेठी जदीद जाने
वाले रास्ते पर मुड़ते हैं। इस खड़ंजा पर रंगीन पानी बहता दिखाई देता है।
खड़ंजा से गांव की सीसी रोड पर जाने से इसके किनारे की नाली में वस्त्र
छपाई कारखानों का पानी बहता नजर आता है। प्रधान मुफीद कहते हैं कि अंगूरी
बाग इलाके में कड़ाई से कारखानादार गांव की ओर आ गए हैं। इनके कारखानों का
पानी गंगा में जाता है। कुल मिलाकर कह सकते हैं सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट
को यहां की कड़वी हकीकत आइना दिखा रही है। हालांकि यहां के बाशिंदों को
उम्मीद बंधी है कि सरकारी पैसा सही इस्तेमाल हुआ तो शायद एक बार फिर से
निर्मल गंगा के दर्शन हो सकेंगे।