मठ के उत्तराधिकारी महंत स्वामी अनंताचार्य महाराज ने बताया कि अयोध्या का एक ऐसा स्थान है जहां तिरुपति बालाजी में विराजमान भगवान व्यंकटेश का विग्रह प्रतिष्ठित है और यहां दक्षिण भारतीय परंपरा में ही भगवान की अर्चना एवं नारद पांचरात्र आगम पद्दति से उपासना की जाती है।
इसी परंपरा का एक स्थान आंध्रप्रदेश के तिरुपति में भी मौजूद है। गुरुदेव महाराज मठ की परंपरा में चौथे आचार्य थे। उनका जन्म अमेठी जिले के रामनगर में ब्राह्मण परिवार में 1925 में हुआ था।
बाल्यकाल से ही भगवत चरणानुरागी थे। परिवार छोड़कर हरिद्वार चले गए और उन्होंने वहां उत्तर तोताद्रिमठ की शाखा नरसिंह भवन में रहते हुए बाल ब्रह्मचारी संत स्वामी सुदर्शनाचार्य से वैष्णव मत की दीक्षा ली।
स्वामी सुदर्शनाचार्य के दूसरे शिष्य एवं तत्कालीन उत्तर तोताद्रि मठ के महंत स्वामी रामानुजाचार्य के आकस्मिक निधन के बाद पांच जून 1976 को वह मंदिर के महंत के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
मंदिर एवं संपत्ति की सुरक्षा के लिए उन्होंने वर्ष 1985 में श्रीबालदेशिक सोपान ट्रस्ट की स्थापना की। स्थान का विकास करते हुए व्यंकटेश सत्संग भवन एवं अतिथि निवास का भी निर्माण कराया और मठ का भी जीर्णोद्धार किया।
आश्रम के माध्यम से चलने वाले श्रीनिवास बोधायन रामानुज संस्कृत विद्यालय को चतुर्थ श्रेणी से प्रथम श्रेणी में लेकर आए। उन्होंने जीवन पर्यंत गो सेवाएं संत सेवा और साहित्य सेवा में अपने को समर्पित किया।