केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय की ओर से 224 करोड़ रुपये की तैयार रामायण सर्किट योजना में राम वनगमन मार्ग से लेकर आस-पास राम के विविध आयामों से जुड़े स्थलों के विकास को लेकर कोई तवज्जो नहीं दी गई है। धार्मिक स्थलों को सड़क व रेल से बेहतर कनेक्विटी पर खर्च का प्रस्ताव भी नहीं है।
यहां आने वाले पर्यटकों को यात्रा की दिक्कतों के साथ रहन-सहन में भी तमाम दुश्वारियां झेलनी पड़ती हैं। इसके कारण विदेशी समेत तमाम पर्यटक अपना ठिकाना लखनऊ, बनारस, इलाहाबाद या गोरखपुर को बनाने के लिए मजबूर होते हैं।
रामायण सर्किट में अयोध्या के विकास के लिए 151 करोड़ रुपये स्वीकृत हुआ है लेकिन इस धन का खर्च उन जगहों पर करने का प्रस्ताव है, जहां पर उसकी बहुत जरूरत नहीं है। पंचकोसी और चौदहकोसी परिक्रमा मार्ग हर वर्ष मेला के पहले अच्छी हालत में हो जाते हैं।
वहां पर शौचायल और विश्राम गृह भी बने हैं, बावजूद इसके वहां पर धनावंटन हुआ है। आखिर यहां पर जब विकास के लिए कोई जगह ही नहीं बची है तो वहां क्यों रुपया खर्च किया जाएगा? यह सवाल लोगों को मथ रहा है।
गुप्तहरि घाट पर सरयू के अन्य घाटों के प्रति ज्यादा आकर्षण लोगों को है लेकिन यहां पर श्रद्धालुओं की आमद के मुकाबले सुविधाओं का अभाव है। गुप्तहरि घाट को तकरीबन पांच सौ मीटर और बढ़ाने की मांग लंबे अर्से से की जा रही थी लेकिन उस पर रामायण सर्किट में विशेष ध्यान नहीं दिया गया।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी ने सरयू नदी पर बने रेल पुल का लोकार्पण किया लेकिन यहां अयोध्या को रामेश्वरम से सीधे जोड़ने के लिए कोई ट्रेन अभी तक नहीं चलाई गई। श्रद्धालुओं को अयोध्या तक आने के लिए सड़क और रेल मार्ग की सर्वाधिक जरूरत होती है।
रेल मार्ग है तो उस पर सीधी ट्रेन नहीं है। जबकि चित्रकूट जाने के लिए अच्छी सड़क का अभाव है। हाल यह है कि अयोध्या चित्रकूट तक कोई सीधी रेल सेवा नहीं है। यहां से इलाहबाद जाकर दूसरी ट्रेन पकड़नी पड़ती है।
84 कोस की सांस्कृतिक परिधि में बिखरी आभा
अयोध्या के 84 कोस की सांस्कृतिक परिधि में रामायण कालीन दर्जनों ऋषियों, मुनियों के आश्रम हैं। ये स्थान फैजाबाद, अंबेडकरनगर, गोंडा, बाराबंकी, बस्ती और सुल्तानपुर जिले में है। आध्यात्मिक विभूतियों से जुड़े इन स्थलों तक पहुंचना श्रद्धालुओं के लिए टेढ़ी खीर है।
ये प्राचीन धार्मिक स्थान पर उपेक्षित हैं। इन स्थानों के विकास और वहां तक जाने के लिए अच्छी परिवहन सुविधा की जरूरत अर्से से है लेकिन उस ओर ध्यान नहीं दिया गया।
संतों ने कहा, राजनीति से परे मनु से राम तक दिखे आभा
मनु से लेकर राम तक की अनुभूति अयोध्या में आने वाले भक्तों को होनी चाहिए। अयोध्या तीर्थ स्थल है तो क्यों? राम परमब्रह्म हैं तो कैसे? इसकी आभा विकास में झलके। यह तभी संभव है जब राजनीति से परे सही स्थान पर काम हो। 84 कोस में जितने महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है, उसका विकास होना चाहिए। ऐसा होगा तभी अयोध्या का रूप-रंग निखरेगा। -आचार्य सत्येंद्र दास, श्रीरामजन्म भूमि के मुख्य पुजारी
अयोध्या का विकास सांस्कृतिक नजरिये से होना चाहिए। संस्कृत की पाठशाला, ज्योतिष के केंद्र खोले जाएं। यहां से जुड़े मनीषियों का एक स्मारक बने जिसमें एक ही परिसर में उनके योगदान का उल्लेख हो। -रमेश दास, हनुमानगढ़ी के पुजारी
अयोध्या को उसकी प्राचीन गरिमा-महिमा के अनुसार विकसित करने की जरूरत है। सरयू किनारे स्थित मंदिरों को एक रंग में रंगने, तुलसीदास के नाम से शोध संस्थान की स्थापना करने, उस काल के पौधों की हरियाली से आच्छादित करने की जरूरत है। -डॉ. रामानंद शुक्ल, कालिकुलालयम तंत्र साधना शोध पीठ के संस्थापक