अयोध्या। राजनीति के लिए चुनाव के बजाय सत्ता के लिए चुनाव के तहत रणनीति बदले जाने के संकेत हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नाम गोरखपुर से घोषित किए जाने को इसी का परिणाम माना जा रहा है।
सूची जारी होने के कुछ दिन पहले अयोध्या में हुए सर्वे और बदलते सियासी हालात के बाद योगी का नाम गोरखपुर से घोषित किया गया। अब अयोध्या विधानसभा के लिए एक कद्दावर नेता का नाम सत्ता के गलियारे चल रहा है।
सियासत के लिए पावर हाउस मानी जाने वाली अयोध्या से चुनाव लड़ने के लिए मुख्यमंत्री का नाम कई महीनों से चर्चा में था। उनका अयोध्या से प्रत्याशी होना लगभग तय माना जा रहा था, लेकिन भाजपा की पहली सूची में बाबा का नाम गोरखपुर से घोषित किए जाने के बाद सियासी पंडितों को भी झटका लगा।
जीत के प्रति आश्वस्त होने के बावजूद बाबा को अयोध्या से नहीं उतारा गया। इसे सियासत का बड़ा झटका कहा गया। अयोध्या में इसका रिएक्शन भी महसूस किया गया। स्वाभाविक है कि इसके पीछे बड़ा सियासी खेल है।
सूत्रों के मुताबिक भाजपा की पहली सूची जारी होने के पांच-छह दिन पहले एक गोपनीय टीम ने अयोध्या का सर्वे किया था। यह टीम न तो सरकारी थी और न ही भाजपा संगठन की।
इस टीम के सदस्यों ने कुछ खास लोगों और संघ के एक बड़े आनुषांगिक संगठन के लोगों के साथ बैठक की थी। बैठक में शामिल एक विश्वस्त सूत्र के मुताबिक बाबा के चुनाव को अस्तित्व की लड़ाई के रूप में लिए जाने की चर्चा तक हुई।
बैठक में मुख्यमंत्री की जीत के प्रति सभी आश्वस्त भी थे। चुनाव के पूर्व और चुनाव के बाद की स्थितियों पर चर्चा की गई। नए सिरे से बाबा की कार्यप्रणाली के मुताबिक व्यवस्था को लेकर भी चर्चा हुई। टीम यहां से रिपोर्ट लेकर चली गई।
इसके बाद सूबे में सियासी हालात तेजी से बदले, सत्ता पर सियासी दबाव बनाने की कोशिश की गई। बाबा का नाम अयोध्या की बजाए गोरखपुर सेे चुनाव लड़ने के लिए सामने आया।
अयोध्या में राम मंदिर के लिए लंबी लड़ाई के बाद राम लला के मंदिर निर्माण के दौर में हो रहे विधानसभा चुनाव के मैदान में बाबा नहीं तो दूसरा कौन! क्योंकि बाबा का नाम आने के बाद यहां का सियासी तापमान चढ़ चुका है।
अयोध्या की सीट भाजपा के लिए हमेशा से अहम रही है। बाबा के गोरखपुर से उतरने के बाद पूर्वांचल को साधने की कोशिश है तो अयोध्या के जरिए मध्य के दो-तीन मंडलों को साधने की कोशिश हो सकती है।
यह सत्ता के गलियारे में भाजपा संगठन में बड़े पद के साथ जनप्रतिनिधि रहे और पिछड़ा वर्ग के एक बड़े नेता का नाम अयोध्या विधानसभा से चुनाव लड़ने के लिए तेजी से चर्चा में उभरने से इसका संकेत मिलता है।
अचानक यह नाम फलक पर आया है। संकेत साफ है कि बाबा के जरिए पूर्वांचल को साधने की कोशिश है तो अयोध्या के जरिए बदले सियासी हालात को काबू में रखने के लिए अयोध्या मंडल के साथ आसपास के जिलों को साधने की कोशिश हो सकती है।
राजनीति के जानकारों का कहना है कि इसके अलावा भी कुछ ऐसे नाम आ सकते हैं जिससे इस क्षेत्र में पार्टी को सियासी लाभ मिल सके। पुरानी पीढ़ी के राजनीति से जुड़े खुशीराम पांडेय कहते है कि चुनाव में केवल एक सीट को नजर में नहीं रखा जाता है।
एक प्रत्याशी के जरिए आसपास की सीटों पर भी इसके प्रभाव का आंकलन करके उतारा जाता है। अयोध्या से जो भी प्रत्याशी होगा, वह अयोध्या की संस्कृति के अनुकूल होगा।
वरिष्ठ अधिवक्ता राम पाल शर्मा कहते हैं कि यह अयोध्या है। यहां से ऐसा प्रत्याशी होना चाहिए जिसका असर आसपास की सीटों के साथ कई जिलों तक हो।