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कार्तिक पूर्णिमा स्नान को लेकर रामनगरी में उमड़े भक्त

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अयोध्या। कार्तिक पूर्णिमा स्नान पर्व की पूर्व संध्या पर ही गुरुवार को रामनगरी में भक्त उमड़ पड़े। प्रशासन दिन भर भीड़ को नियंत्रित करने व सुरक्षा को लेकर प्लान बनाने में जुटा रहा है।
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पूर्णिमा गुरुवार सुबह 11 बजे से ही लग गई है ऐसे में बड़ी संख्या में भक्तों ने सरयू में स्नान कर दर्शन-पूजन किया। मुख्य स्नान पर्व शुक्रवार को है, ऐसे में सरयू तट पर लाखों की भीड़ जुटने की उम्मीद है।
चौदहकोसी व पंचकोसी परिक्रमा सकुशल संपन्न कराने के बाद कार्तिक परिक्रमा मेले के आखिरी पड़ाव पूर्णिमा स्नान की तैयारी को लेकर गुरुवार को प्रशासनिक अधिकारियों ने ब्रीफिंग कर मेले की व्यवस्था में लगे पुलिसकर्मियों को उनका दायित्व समझाया।
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अयोध्या में श्रीराम व बजरंगबली का जयघोष गूंज रहा है। चूंकि पूर्णिमा गुरुवार को सुबह 11 बजे से ही लग गई है ऐसे में दर्शन-पूजन व स्नान का दौर शुरू हो चुका है।
बड़ी संख्या में भक्तों ने गुरुवार को भी पावन सलिला सरयू में स्नान कर विभिन्न मठ-मंदिरों में दर्शन-पूजन किया। हनुमानगढ़ी में दिन भर दर्शन को भक्तों की कतार लगी रही। रामलला का दरबार भी भक्तों से गुलजार रहा।
हालांकि उदयातिथि की मान्यता वाले बड़ी संख्या में भक्त शुक्रवार अलसुबह से सरयू में स्नान के लिए उमड़ेंगे। रामनगरी में शुक्रवार को ही देव दीपावली का पर्व भी मनाया जाएगा।
सरयू तट पर दीपदान एवं महाआरती का आयोजन होगा। पूर्णिमा पर्व को लेकर प्रशासन ने तैयारी पूरी कर ली है। मेेला क्षेत्र में यातायात डाववर्जन सहित सुरक्षा का खाका तैयार किया जा चुका है।
पंचांग के अनुसार साल का आठवां महीना कार्तिक महीना होता है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा कार्तिक पूर्णिमा कहलाती है। सृष्टि के आरंभ से ही यह तिथि बड़ी ही खास रही है।
पुराणों में इस दिन स्नान, व्रत व तप की दृष्टि से मोक्ष प्रदान करने वाला बताया गया है। रामनगरी के प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. हरिप्रसाद दुबे ने बताया कि कार्तिक पूर्णिमा का पर्व सिर्फ वैष्णव व शैव भक्तों ही नहीं बल्कि सिख धर्म के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।
विष्णु के भक्तों के लिए यह दिन इसलिए खास है क्योंकि भगवान विष्णु का पहला अवतार इसी दिन हुआ था। इसी दिन भगवान भोलेनाथ ने त्रिपुरासुर नामक महाभयानक असुर का संहार किया था।
जिससे वह त्रिपुरारी के रूप में पूजित हुए। इसलिए इसे ‘त्रिपुरी पूर्णिमा’ भी कहते हैं। डॉ. दुबे ने बताया कि सिख धर्म में कार्तिक पूर्णिमा के दिन को प्रकाशोत्सव के रूप में मनाया जाता है। क्योंकि इसी दिन सिख संप्रदाय के संस्थापक गुरु नानक देव का जन्म हुआ था।
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