शाहबाद के गांव सैफनी गई मुसलिम युवक की बारात में बैंड बाजा बजवाना परिवार को महंगा पड़ गया।
उलेमाओं ने बारात में बाजा बजने की तसदीक होने पर संबंधित परिवार का पांच साल के लिए सामाजिक बहिष्कार करने का निर्णय लिया।
नगर में ईदगाह से मुंडिया भीकम को जाने वाले रास्ते के किनारे रह रहे एक युवक की बारात बृहस्पतिवार को रामपुर जिले में थाना शाहबाद अंतर्गत सैफनी गांव गई थी।
बिलारी नगर में पूर्ण प्रतिबंध होने की वजह से दूल्हा के मोहल्ले में बाजा नहीं बजा। लेकिन सैफनी पहुंचकर उसकी बारात चढ़नी शुरू हुई तब दुल्हन पक्ष ने व्यवस्था करके अपनी ओर से बाजा बजवा दिया।
शुक्रवार को जब यह बात तंजीमुल आइम्मा कमेटी के सदस्यों को पता चली तब बड़ी संख्या में नगर के आलिम डाकबंगले वाली मस्जिद में इकट्ठा हुए।
आलिमों के मस्जिद में पहुंचने की खबर पर मोहल्ले और कई जिम्मेदार लोग भी वार्ता में पहुंचे।
नगर के शहर इमाम मौलाना सदाकत हुसैन ने दूल्हे के पिता को बुलाकर उनसे विस्तार से जानकारी ली। इस दौरान दूल्हे के पिता ने बताया कि न तो उन्होंने अपने घर बैंडबाजा बजवाया और न ही वह किसी बैंडबाजा पार्टी को सैफनी ले गए।
कहा कि उनके बेटे की बारात में जो बाजा बजा उसकी व्यवस्था दुल्हन पक्ष ने की थी। दूल्हे के पिता ने यह भी कहा कि दूल्हा को छोड़कर वह या उनका कोई रिश्तेदार बाजे के साथ नहीं चल रहा था।
इस दौरान आरोप प्रत्यारोप के बीच हंगामा होने लगा। शहर इमाम ने गणमान्य नागरिकों और उलेमाओं से राय लेने के बाद फैसला सुनाया कि जिस दूल्हे की सैफनी में गई बारात में बाजा बजा है उस परिवार का पांच साल तक सामाजिक बहिष्कार रहेगा।
क्या है परिवार के सामाजिक बहिष्कार में सजा
शहर इमाम मौलाना सदाकत हुसैन ने स्पष्ट किया कि पांच साल तक इस परिवार की मोहल्ले और बस्ती में न तो कोई किसी तरह के समारोह में दावत करेगा और न ही कोई इस परिवार के घर किसी भी तरह की दावत में जाएगा।
बिलारी बस्ती के लोग न तो इस परिवार के घर जाकर बैठेंगे और न ही अपने यहां बुलाएंगे। पता यह भी चला है कि पांच साल के सामाजिक बहिष्कार की अवधि में यदि इस परिवार के किसी सदस्य की मौत होती है तब नगर का कोई उलेमा मृतक की नमाजे जनाजा भी नहीं पढ़ाएगा।