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कुएं से निकलती दैत्य की आवाज

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चकरनगर। पारपट्टी क्षेत्र में बकासुर दानव का खौफ आज भी कायम है। जिस कुएं में भीम ने बकासुर को बंधक बना कर रथ समेत डाल दिया था। दीपावली वाले दिन अमावस्या को उस कुएं से अभी भी जोर की आवाजें सुनाई देती हैं। दीपावली वाले दिन आज भी दैत्य के भय से कोई कुआं की तरफ नहीं जाता।
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यमुना नदी किनारे स्थित महाभारत कालीन चक्र नगरी वर्तमान खेरा धार्मिक स्थल पर पांडवों के अज्ञातवास काल में रुकने के सबूत धार्मिक ग्रंथों में हैं। महाभारत काल में कौरवों के आगे जुए में अपना सब कुछ हार कर अज्ञातवास बिताने वाली चक्र नगरी वर्तमान में चकरनगर खेरा के जंगलों में आए थे।
मान्यता है कि कस्बा बकेवर के एक स्वर्णकार का पुत्र बकासुर दैत्य प्रवृत्ति के चलते लोगों का अपना आहार बना रहा था।
जिसके आतंक से चक्रनगरी के लोग आतंकित थे। पांडवों की मां कुंती संग गांव में भिक्षा मांगने निकली। एक घर में शादी का माहौल मातम पसरा हुआ था। कुंती ने जब सारा माजरा पूछा तो पता चला कि इस घर के इकलौते वारिस की आज ही शादी होकर आई है।
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उसी को आज बकासुर का आहार बनना है। कुंती ने आश्वासन दिया कि आज तुम्हारा बेटा दानव का भोजन नहीं बनेगा। अपनी कुटिया में आकर कुंती ने अपने पुत्र भीम को आदेश दिया कि गुलगुले, खीर, पकवान आदि लेकर तुमको जंगलों में स्थित बकासुर दानव के पास जाना है।
पर ध्यान रहे कि उसका वध नहीं करना है, मल्ल युद्ध में परास्त करके आतंक से गांव वालों को निजात दिलाना है। मां का आदेश सुनते ही भीम गांव पहुंचे और सारा सामान लेकर खेरा स्थित बकासुर दाने की गुफा में जा पहुंचे।
वहां बैठकर बड़े चाव से पुए, खीर पकवान खाने में व्यस्त हो गए। भोजन की खुशबू से नींद से जागे दानव ने भीम को देखकर आश्चर्य किया और हंसने लगा। सारा खाना भीम ने ही खा लिया। इस पर दैत्य बहुत ही क्रोधित हो गया। उसने भीम पर हमला कर दिया।
दोनों का मल्ल युद्ध 7 दिन तक चला। भीम ने बकासुर दानव को बंधक बनाकर उसकी नाक में लोहे के कड़े से नाथ डाल दी और बैलगाड़ी में जकड़ कर कुएं में फेंक दिया। दानव के आतंक गांव वालों को मुक्ति मिल गई। इसका उल्लेख महाभारत काव्य में है।
मल्ल युद्ध के निशान आज भी मिलते हैं
क्षेत्रीय लोगों व राज परिवार चकरनगर स्टेट के लोग भी बताते हैं चकरनगर खेड़ा पर दाना और भीम के मल्ल युद्ध के निशान आज भी देखने को मिलते हैं। ग्रामीणों में किवदंती है कि बकासुर दैत्य आजाद होने के लिए सक्रिय हो उठता है।
दीपावली को रात बारह बजे चीखने चिल्लाने के साथ शांत हो जाता है। दैत्य के भय से दिवाली के पर्व तक कुएं के आसपास से भी कोई नहीं गुजरता है।
रमणीक स्थल देखने दूर से आते हैं लोग
यमुना किनारे स्थित रमणीक स्थल को देखने आज भी सैकड़ों लोग दूर-दूर से आते जाते हैं। राज्यपाल पुरस्कार से पुरस्कृत पंडित आचार्य ब्रह्म कुमार मिश्र बताते हैं कि आसुरी शक्तियों के पास जाने से मनुष्य में दैत्य प्रवृत्तियां पैदा हो जाती है।
खेरा स्थल कुआं के पास दिवाली तक मानव का जाना घातक माना जाता है। जिसके चलते कोई भी उस ओर नहीं जाता है। राजवंश परिवार के हरिहर सिंह चौहान बताते हैं कि बुजुर्ग भी कुएं की ओर जाना दीपावली तक प्रतिबंधित कर देते थे।
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विजयदशमी के बाद कोई भी क्षेत्र का चरवाहा भी खेरा जंगल कुआं की ओर नहीं जाता है।
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