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पचनद में डुबकी लगाने से पापों से मुक्ति

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चकरनगर। 19 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर पचनद संगम में डुबकी लगा कर भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना करने से पापों से मुक्ति मिलती है और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
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मंदिर कमेटी ने मेला व स्नान ध्यान के लिए तैयार शुरू कर दी हैं। बीहड़ के तीर्थराज में हजारों की संख्या में साधु संत के अलावा अन्य शहरों से भक्तजन पूजा अर्चना करने व स्नान ध्यान के लिए पहुंचते हैं।
मान्यता है कि द्वापर में भगवान विष्णु ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन माया श्री व भगवान भोलेनाथ की आराधना कर जन कल्याण के लिए सुदर्शन चक्र पचनद संगम पर ही धारण किया था।
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धार्मिक पौराणिक महत्व से सबसे दुर्लभ स्थान पचनद संगम पर कार्तिक पूर्णिमा के दिन बनारस व हरिद्वार छोड़कर साधु-संत बड़ी संख्या संगम में डुबकी लगाकर भोलेनाथ की आराधना करते हैं।
देश दुनिया की सबसे पावन जगह पचनद संगम में कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान व भोलेनाथ का ध्यान करने से मनोवांछित लाभ मिलता है। पापों से मुक्ति हो जाने की मान्यता है।
चकरनगर से लखना सिंडोस मार्ग से हनुमंतपुरा चौराहा से बिठोली रोड 25 किमी दूर स्थित यमुना, चंबल, यमुना, सिंध और पहुंज नदियों का महासंगम दुर्लभ स्थान बीहड़ी घाटियों में बसा है।
कार्तिक पूर्णिमा पर यहां स्नान करने से देवी-देवताओं को सहजता से प्रसन्न किया जा सकता है। साधुओं ने वेद पुराण के मुताबिक बताया कि द्वापर काल में पचनद संगम स्थित मायासुरी की आराधना कर विष्णु ने जन कल्याण के लिए सुदर्शन चक्र मांगा।
उन्होंने भोलेनाथ की कृपा पात्र होने का आशीष दिया। भोलेनाथ ने विष्णु को सुदर्शन चक्र धारण करवाया। पंचनद धाम को सुदर्शन चक्र धाम भी कहा जाता है।
महाभारत काल में पांडवों को कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही ब्रह्म मुहूर्त में कालेश्वर भगवान का स्नान ध्यान कर पूजा अर्चना कर कौरवों को युद्ध में परास्त करने के लिए विजयश्री की मांग की। भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर आशीर्वाद देने के बाद स्वप्न में आकर युधिष्ठिर से कहा कि तुम्हारी विजय होगी।
तीर्थराज की भी दी गई है मान्यता
पचनद संगम को तीर्थराज की भी मान्यता दी गई है। आस्थावान बताते हैं कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान कार्तिक की पूजा की जाती है, जो दक्षिण दिशा के स्वामी हैं।
दीपदान व गोवंश दान करने से स्वर्ग में पुण्य जमा होता है। देव दिवाली को ब्रह्म मुहूर्त में संगम में स्नान करने के बाद चंद्रमा को जल अर्पित किया जाता है। दूर से आने वाले श्रद्धालु कार्तिक पूर्णिमा के एक-दो दिन पहले ही तीर्थ स्थल क्षेत्र में आकर डेरा डाल देते हैं।
लॉकडाउन हटने के बाद कार्तिक पूर्णिमा के मेले को लेकर क्षेत्रीय दुकानदार काफी उत्साह में दिखाई दे रहे हैं। मेले में खानपान की वस्तुओं के साथ महिलाएं सामान खरीदती हैं। बाल गोपाल खेल खिलौने खाने पीने की चीजों का लुफ्त उठाते हैं।
दो दिवसीय मेले का होता है आयोजन
कार्तिक पूर्णिमा को दो दिवसीय मेले का आयोजन होता है। मंदिर के पुजारी किशोर बताते हैं कि साधु-संतों के ठहराने की व्यवस्था के अलावा महिला व पुरुषों के स्नान के लिए घाटों पर अलग-अलग व्यवस्था की गई है।
स्नान, ध्यान, पूजा-अर्चना में कोई परेशानी न हो, इसके लिए मंदिर कमेटी के सभी लोग सक्रिय हो गए हैं। मंदिर परिसर में सात दिवसीय अखंड पाठ का आयोजन शुरू हो चुका है। लोग नियमित रूप से आकर अखंड पाठ में शामिल होकर पूजा-अर्चना कर रहे हैं।
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