फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

नलकूपों पर ताले, सिंचाई के लाले

विज्ञापन
विज्ञापन
चकरनगर। किसानों को सिंचाई के लिए मुफ्त पानी मुहैया कराने के लिए सरकारी नलकूपों की स्थापना की गई थी। चकरनगर क्षेत्र में लगभग 100 सरकारी नलकूप हैं, लेकिन ये नलकूप किसानों के लिए किसी भी प्रकार से उपयोगी नहीं है। ये पूरी तरह से ठप पड़े हुए हैं।
विज्ञापन

किसान गेहूं की सिंचाई के लिए निजी ट्यूबवेल पर निर्भर हैं। निजी ट्यूबवेल से सिंचाई करने पर किसानों को बहुत महंगा पड़ता है। बीहड़ी क्षेत्र होने के कारण किसानों को खेतों की सिंचाई का मात्र एक साधन विद्युत मोटर युक्त वाटर पंप हैं।
वाटर लेबल 180 से 200 फीट गहरा होने की वजह से कम पावर वाले नलकूप सफल नहीं होते हैं। पानी काफी गहराई में होने की वजह से निजी नलकूप लगवाना भी काफी महंगा पड़ता है।
विज्ञापन

जिन किसानों के पास निजी नलकूप हैं, वे दूसरे किसानों को मनमानी कीमत पर सिंचाई का पानी मुहैया कराते हैं। सरकारी नलकूपों की स्थापना किसानों को सस्ती सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराना था, लेकिन ये उद्देश्य अधूरा है।
क्षेत्र में सरकारी नलकूपों की संख्या लगभग 100 है। किसानों की माने तो सरकारी नलकूपों का रखरखाव न होने के कारण यह नलकूप दिखावा मात्र हैं। एक दो महीना चलने के बाद सरकारी नलकूप खराब हो जाते हैं।
फिर छोटी-छोटी कमी की वजह से महीनों ठप पड़े रहते हैं। अभी जो नलकूप चल रहे हैं, उन पर दबंग किसानों का कब्जा है। कृषक महावीर सविता बताते हैं कि हमारे खेत में ही सरकारी नलकूप है।
चार साल पहले स्थापित हुआ था। जिस खेत में ये नलकूप लगा है, उसी की सिंचाई नहीं हो पाती। प्राइवेट नलकूप से फसलों की सिंचाई कर रहे हैं। अर्जुन कुशवाहा बताते हैं कि सरकारी नलकूप केवल दिखावे के लिए खेतों में लगे हैं।
सरकार के पैसे का विभाग द्वारा खुलेआम दुरुपयोग किया जा रहा है। किसानों का इसको कोई लाभ नहीं मिल रहा है। फसलों की सिंचाई के लिए प्राइवेट नलकूपों के भरोसे हैं।
सुरेश सविता बताते हैं कि 40 से 45 लाख की लागत में एक सरकारी नलकूप स्थापना होती है, इतनी लागत में पांच से छह निजी नलकूप स्थापित हो सकते हैं।
सरकारी नलकूप से बीघा भर फसल सिंचित नहीं होती, जबकि प्राइवेट नलकूप से 200 बीघा जमीन आराम से सिंचाई हो जाती है। सरकारी नलकूपों की क्षेत्र में स्थिति बेहद चिंताजनक है।
प्रशासन को इस ओर ध्यान देना चाहिए, जिससे किसानों को लाभ मिल सके। पप्पी सिंह बताते हैं कि सरकारी नलकूप की उम्र ज्यादा से ज्यादा चार या पांच वर्ष तक विभाग के लोग खींचतान कर चलाते हैं।
उसके बाद कंडम घोषित हो जाता है। क्षेत्र में प्राइवेट नलकूप कहीं पर भी फेल नहीं हुए, जबकि सरकारी नलकूपों की खेतों में जगह-जगह कोठरी खंडहर के तौर पर देखी जा सकती हैं। रखरखाव के अभाव में सरकारी नलकूप दम तोड़ रहे हैं।
ब्लाक क्षेत्र में 80 नलकूप किसानों खेतों की सिंचाई के लिए स्थापित हैं। वर्तमान समय में ज्यादातर नलकूप पानी दे रहे, जिनका संचालन विभागीय कर्मचारी नलकूप ऑपरेटर द्वारा किया जा रहा है। नलकूप खराब होने पर सप्ताह भर के अंदर दुरुस्त कराया जाता है, जिससे किसानों की फसलों को समय से पानी मिल सके।
विज्ञापन

- मांगेराम, अधिशासी अभियंता, नलकूप खंड
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें