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भदावरी भैंस के घी पर भारी मुर्रा का दूध

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इटावा। जिले के किसान अब स्थानीय नस्ल की भैंस भदावरी को पालने में रुचि लेने के बजाय हरियाणा की मुर्रा नस्ल की भैंस को तरजीह दे रहे हैं। इसकी वजह भदावरी भैंस दुग्ध उत्पादन में मुर्रा से काफी पीछे है, जबकि भदावरी भैंस घी के उत्पादन में अव्वल मानी जाती है।
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इसका घी विशेष खुशबू की वजह से काफी पसंद किया जाता रहा, लेकिन व्यावसायिक दौर में अब इस नस्ल पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। जिले में भदावरी भैंस नस्ल संरक्षण के लिए प्रदेश सरकार ने केंद्र बनाया है, जहां भैंसों को पाला जाता है।
नस्ल संरक्षण के कार्यक्रम भी चलाए जाते हैं। इसके बाद भी किसानों में रुचि नहीं है। लुप्त हो रही प्रजाति को बचाने के लिए करीब चार दशक पहले शुरू की गई योजना लाख प्रयासों के बाद भी किसानों को लुभा नहीं पाई।
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किसानों के पास इस नस्ल की भैंसों का पालन करने वाले किसानों की संख्या एक सैकड़ा का आंकड़ा भी नहीं छू सकी है। इटावा, बाह, भिंड और चकरनगर इलाका एक समय में भदावरी भैंस का प्रमुख क्षेत्र माना जाता रहा है।
इस भैंस के दूध से बना घी इटावा ही नहीं देश के विभिन्न हिस्सों अपनी गुुुणवत्ता और खुशबू के कारण जाना जाता है। 80 का दशक आते-आते भदावरी भैंस के पालन से किसान विमुख होने लगे। यह प्रजाति विलुप्त होने की कगार पर पहुंचने लगी।
इसके बाद प्रदेश सरकार ने वर्ष 1980-81 में इटावा में भदावरी भैंस एवं जमुना पारी बकरी संरक्षण केंद्र की स्थापना की। इसका उद्देश्य भदावरी भैंस की नस्ल संरक्षण के साथ-साथ किसानों को इसके पालन के लिए प्रेरित करना है।
संरक्षण केंद्र की स्थापना लगभग 74 हेक्टेयर में की गई थी। दो हेक्टेयर का एरिया छोड़ बाकी की जगह पर कृषि फार्म बनाया गया। यह जगह वन विभाग ने दी थी।
लायन सफारी की स्थापना के बाद वन विभाग ने अपनी काफी जमीन वापस ले ली। अब सिर्फ 10 एकड़ भूमि ही बची है। जिस पर पशुओं के लिए हरा चारा पैदा किया जाता है।
भदावरी भैंस की विशेषता
भदावरी भैंस के दूध में सर्वाधिक 12 फीसदी फैट होता है। इतना फैट किसी अन्य भैंस के दूध में नहीं होता। यही कारण है कि इसका बना घी और खोया काफी गुणवत्तापूर्ण होता है।
देेेेश भर में इसकी डिमांड रहती है। भदावरी के मुकाबले अन्य भैंस के दूध में पांच प्रतिशत फैट ही पाया जाता है। यही कारण है कि सरकार इस नस्ल का संरक्षण कर रही है।
दूध की उत्पादकता है कम
भदावरी भैंस दूध कम देती है। औसतन इस नस्ल की भैंस एक दिन में छह से 10 लीटर दूूूध ही देती है, जबकि मुर्रा भैंस एक दिन में 20 लीटर तक दूध देती है।
यही कारण है कि जो किसान पशुपालन को अपना व्यवसाय बनाते हैं, वे मुर्रा भैंस पालना ज्यादा पसंद करते हैं, क्योंकि खर्चा दोनों में बराबर आता है। आमदनी के लिहाज से मुर्रा ज्यादा फायदा पहुंचाती है।
भदावरी फार्म में हैं 198 भैंसें
भदावरी फार्म में इस समय कुल 198 भैंस हैं। इनमें केवल 55 भैंस दूूूूूध दे रही है। शासन के आदेश पर यहां से करीब 150 लीटर दूध रोजाना 45 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से बेचा जाता है।
भदावरी भैंस की नस्ल संरक्षण के लिए किसानों को भी जागरूक होना पड़ेगा। फार्म में हर साल किसानों को विजिट कराया जाता है। दूसरे जिलों के किसान भी यहां आते हैं।
इसके बाद भी भैंस को पालने से किसान कतराते हैं। शासन के निर्देश पर नस्ल संरक्षण को लेकर विभाग जागरूक है। अभी फार्म में पंप आपरेटर, ट्रैक्टर आपरेटर, ग्रुप थ्री स्टाफ सहित कर्मचारियों की कमी है। इसके लिए भी शासन को पत्र लिखा गया है।
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-डॉ. आरपी शर्मा, प्रभारी, भदावरी फार्म
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