उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय सैफई
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सैफई। उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय सैफई डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा है। बगैर डॉक्टरों के करोड़ों के चिकित्सा उपकरण मरीजों को कोई लाभ नहीं पहुंचा पा रहे हैं। पिछले तीन सालों में विश्व विद्यालय से 60 डॉक्टर जा चुके हैँ। उनकी जगह नई नियुक्तियां न होने से पद खाली पड़े हैं।
तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने वर्ष 2004 में सैफई में मिनी पीजीआई की नींव रखी थी। पहले इसका नाम उत्तर प्रदेश ग्रामीण आयुर्विज्ञान एवं अनुसंधान संस्थान था। तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सरकार में तीन मई 2016 को उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय सैफई का दर्जा दिया गया। 5 जून 2016 को संस्थान पूरी तरह से विश्वविद्यालय में परिवर्तित हो गया था। बीते तीन वर्ष से डॉक्टरों की कमी के कारण मरीज बाहर जाने को मजबूर होते हैं। तीन वर्ष में 60 डॉक्टर यहां से चले गए। एक वर्ष में डॉ. अहमद अंसारी न्यूरो सर्जन, डॉ. प्रवीण मेंहदी दत्ता कैंसर सर्जन, डॉ. अर्चना वर्मा न्यूरोलॉजी प्रोफेसर, डॉ. सुनील कुमार ऑर्थोपेडिक सर्जन, डॉ. आलोक कुमार फॉरेंसिक मेडिसिन विभाग जा चुके हैं।
इमरजेंसी ट्रामा सेंटर में 300 बेड, ओपीडी व पुरानी मंजिल में 700 बेड है। अब यहां पर डॉक्टरों की कमी है। कुछ डॉक्टर बताते हैं यहां पर ढाई सौ डॉक्टर होना जरूरी है। वर्तमान में सौ डॉक्टर ही काम कर रहे हैं। ऐसे में न्यूरो, कैंसर, हड्डी, हृदय जैसे गंभीर बीमारों के इलाज की कोई सुविधा नहीं है। आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर अक्सर हादसे होते रहते हैं। इस कारण यहां पर मरीजों की भी संख्या बढ़ने लगी है। इस कारण यहां पर डॉक्टर की अधिक जरूरत पड़ रही है। कई विभाग ऐसे भी जिनमें डॉक्टर ही नहीं हैं। यहां पर कोई भी फैकल्टी नहीं है।
आदर्श चुनाव आचार संहिता के कारण भर्ती प्रक्रिया रुकी है। 10 मार्च के बाद डॉक्टरों की भर्तियां की जाएगी।
-सुरेश चंद्र शर्मा, कुलसचिव