वेद मंत्रों के साथ कंप्यूटर की भी शिक्षा
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बदलते वक्त में हावी होती पाश्चात्य संस्कृति और शिक्षा के व्यवसायीकरण के बीच एक ऐसी भी पाठशाला है, जहां विद्यार्थियों को सांस्कृतिक मूल्यों और आदर्शों का ज्ञान कराया जाता है। वेद मंत्रों की गूंज के साथ यहां कंप्यूटर के जरिए विद्यार्थियों को तकनीकी ज्ञान से रूबरू कराया जाता है। उनको सांस्कृतिक मूल्यों का पाठ पढ़ाकर सांस्कृतिक विरासत को भविष्य के लिए संजोया जा रहा है। कुछ ऐसी ही कहानी है शहर के आर्ष गुरुकुल की।
गुरुकुल का नाम सुनते ही प्राचीन शिक्षा व्यवस्था का चित्र परिलक्षित होने लगता है, तो प्राचीन काल की व्यवस्था यहां जीवंत नजर आती है। यहां विद्यार्थी योग और यज्ञ के साथ संस्कारों से निपुण हो रहे हैं। गुरुकुल के विद्यार्थियों की सफलता का परचम देश ही नहीं विदेशों में भी लहरा रहा है। आजादी के बाद 1948 में स्वामी ब्रह्मानंद शास्त्री ने शहर के कासगंज रोड पर आर्ष गुरुकुल की नींव रखी थी। नौनिहालों और युवाओं को संस्कृत भाषा के साथ वैदिक मंत्रों में समाहित सांस्कृतिक मूल्यों को ज्ञान कराना शुरू कर दिया। शिष्यों को प्रतिदिन वैदिक ज्ञान के साथ लौकिक ज्ञान कराया जाता। वक्त बदला तो वर्ष 1964 में गुरुकुल की जिम्मेदारी आचार्य देवराज शास्त्री पर आ गई। उन्होंने युवा पीढ़ी को भारतीय संस्कृति भूलते और पाश्चात्य संस्कृति की ओर बढ़त देख तकनीकी ज्ञान को भी गुरुकुल शिक्षा से जोड़ा। महर्षि दयानंद संस्कृत विवि रोहतक से मान्यता मिलने पर गुरुकुल में कंप्यूटर शिक्षा की भी शुरुआत कराई। मेहनत का असर हुआ कि गुरुकुल से शिक्षा-दीक्षा पूरी कर निकले तीन हजार से भी अधिक शिष्य देश ही नहीं विदेश में संस्कृत, संस्कृति, नैतिकता के साथ सांस्कृतिक मूल्यों का डंका बजा रहे हैं। वर्तमान में गुरुकुल में 65 बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। जिन्हें धार्मिक, नैतिक और सामाजिक के साथ लौकिक शिक्षा दी जाती है। सुबह पांच बजे से बच्चों को यज्ञ, योग, प्राणायाम, सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेती, बागवानी समेत वेदों का ज्ञान कराया जाता है। गुरुकुल में बनी कंप्यूटर प्रयोगशाला में बच्चे बदलती दुनियां से मुकाबला करने गुर सीखते हैं। आचार्य देवराज शास्त्री बताते हैं कि जरूरी है कि बच्चों और युवाओं को मातृ-पितृ भक्ति का पाठ पढ़ा कर सांस्कृतिक मूल्य विकसित किए जाए। गुरुकुल के जरिए युवाओं को संस्कृति से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। मेधाव्रत शास्त्री कहते हैं कि गुरुकुल में विद्यार्थियों ने काफी कुछ सीखा है। इसका परिणाम है कि गुरुकुल के विद्यार्थी देशभर में सांस्कृतिक मूल्यों का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।