एटा। स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में मारहरा कस्बे के नियाज अहमद जुबैरी का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। उन्होंने युवावस्था में ही अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष का रास्ता चुन लिया था। वह असहयोग आंदोलन, खिलाफत आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रहे। असहयोग आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के कारण उन्हें एक वर्ष के कठोर कारावास और 50 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई।
महात्मा गांधी के आह्वान पर नमक सत्याग्रह में भी उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और जेल की सजा भुगती। वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी उन्हें छह महीने तक जेल में रहना पड़ा और अंग्रेजों की यातनाएं सहीं। नियाज अहमद जुबैरी के जीवन से जुड़ी कई घटनाएं उनकी देशभक्ति और कौमी एकता की मिसाल पेश करती हैं। बताया जाता है कि जेल में जब उनसे पिता का नाम पूछा गया तो उन्होंने अपनी वल्दियत ‘महात्मा गांधी’ बताई। उनकी मां के इंतकाल के बाद वह पार्थिव शरीर को तिरंगे में लपेटकर अलीगढ़ से मारहरा लेकर आए थे।
वर्ष 1931 में एटा जेल में एक अंग्रेज जेलर ने एक हिंदू कैदी को केवल इसलिए ठोकर मार दी क्योंकि वह पवित्र गीता का पाठ कर रहा था। इस घटना से नाराज नियाज अहमद जुबैरी ने अंग्रेज जेलर को थप्पड़ जड़ दिया था। इसके बाद उन्हें काल कोठरी की सजा भुगतनी पड़ी। नियाज अहमद जुबैरी प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी कैलाश नाथ काटजू के साथ मध्य प्रदेश की जेल में भी रहे।
उनके छोटे भाई अजरज अहमद जुबैरी भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वह अजमेर में वकालत करते थे और पंडित जवाहरलाल नेहरू से उनकी घनिष्ठ मित्रता बताई जाती है। असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने भी छह महीने जेल में बिताए। देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले नियाज अहमद जुबैरी का निधन महज 53 वर्ष की आयु में हुआ। उनका जीवन त्याग, साहस, देशभक्ति और हिंदू-मुस्लिम एकता की उस विरासत का प्रतीक है जिसे आज भी मारहरा और एटा के इतिहास में सम्मान के साथ याद किया जाता है।