जिले की सदर सीट पर लोधे और यादव जाति का हमेशा से बोलबाला रहा है। आजादी के बाद हुए 16 विधानसभा चुनावों में पंद्रह बार इन्हीं जातियों के विधायक चुने गए। इनमें भी नौ बार एक ही परिवार से विधायक चुने गए। सिर्फ 1952 में हुए पहले विधान सभा चुनाव में जीत का सेहरा वैश्य समाज के होतीलाल दास के सिर बंधा था।
परिसीमन बदले, राजनीतिक परिदृश्य एवं दलों के वर्चस्व में उतार चढ़ाव आया, लेकिन प्रतिनिधियों के लिए विधानसभा चुनाव के जातीय समीकरण जस के तस रहे। मुस्लिम, दलित, सवर्ण, अन्य पिछड़ों की अच्छी संख्या होने के बावजूद भी सदर सीट का प्रतिनिधित्व यादव और लोधा समाज के हाथों में रहा। कभी कांग्रेस, बीकेडी, जनता दल, सपा तो कभी भाजपा को जीत तो मिली, लेकिन जीत का सेहरा यादव और लोधा बिरादरी नेताओं के सिर बंधता रहा। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अभी तक संपन्न 16 विधानसभा चुनावों में पहली बार जहां वैश्य समाज के होतीलाल दास विधायक ने जिले का प्रतिनिधत्व किया और बाकी के पंद्रह विधानसभा चुनाव में से नौ बार लोधी एवं छह बार यादव बिरादरी के प्रत्याशियों के सिर जीत का सेहरा बंधा।
एक ही परिवार ने जीते नौ विधानसभा चुनाव
नौ बार विधायक बने लोधी समाज के एक ही परिवार के तीन सदस्य हैं। सदर विधानसभा सीट से छह बार गंगा प्रसाद वर्मा (1957 से 1980 )विधायक बने, दो बार उनके चचेरे भाई प्रीतम सिंह वर्मा (1991 से 1995) एवं एक बार उनके पुत्र प्रजापालन वर्मा (2007 से 2012) विधायक चुने गए। कैलाश यादव (1980 से 1985), दो बार अतर सिंह यादव (1985 से 1991), दो बार शिशुपाल सिंह यादव (1996 से 2007)एवं वर्तमान विधायक आशीष यादव (2012-अबतक) शामिल हैं।