एटा। मकर संक्रांति पर्व पर बड़े स्तर पर पतंगबाजी होती है। ऐसे में पतंग, डोर, मांझे की मांग बढ़ गई है, लेकिन शहर में दुकानों पर पारंपरिक मांझा नहीं दिख रहा है। अधिक मुनाफे के कारण मांग का हवाला देते हुए दुकानदार चीनी मांझा बेच रहे हैं। उन्हें हादसों के खतरे की परवाह नहीं है। जिम्मेदारों की भी कोई रोक-टोक नहीं है।
चीनी मांझा अधिक धारदार और मजबूत होता है, जो आसानी से नहीं टूटता है। इससे पतंगबाजी के दौरान पक्षियों के साथ ही कोई और भी चपेट में आता है तो घायल होने के अलावा जान तक जा सकती है। यह बिजली के तार में चिपक जाता है, तो शॉर्ट सर्किट होने से आग लगने की घटना भी हो जाती है। इसके अलावा ये पर्यावरण के लिए भी नुकसानदायक है। इससे पक्षी तो मरते ही हैं बल्कि लंबे समय तक मिट्टी और पानी में पड़े रहने पर प्रदूषण फैलता है। देश के विभिन्न हिस्सों में इसकी चपेट में आने से कई लोगों की मौत भी हो चुकी है। स्थानीय स्तर पर प्रशासन की ओर से इस मांझे पर रोक लगाने के लिए जिले में कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है। जिसकी वजह से बाजारों में खुलेआम चीनी मांझा धड़ल्ले से बिक रहा है।
सस्ता होने के कारण ज्यादा खरीदते हैं पतंगबाज
कटरा मोहल्ले के रहने वाले एक व्यक्ति ने बताया कि देसी मांझा महंगा होता है और चीनी सस्ता आता है। जिसके कारण पतंग उड़ाने वाले लोग इसी को ज्यादा खरीदते हैं। इसकी कीमत एक रुपये में 5 मीटर है और देसी मांझा 1 रुपये में 2 से 3 मीटर तक ही मिल पाता है।