फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मुलायम और बेनी क्यों पूछ रहे एक दूसरे की औकात?

Tue, 19 Mar 2013 05:09 PM IST
अवनीश पाठक/इंटरनेट डेस्क
विज्ञापन
विज्ञापन
मुलायम सिंह यादव और बेनी प्रसाद वर्मा किसी जमाने में उत्तर प्रदेश की राजनीति में 'जय और वीरू' थे। उनका याराना ऐसा था कि मुलायम पर आरोप लगे तो बेनी जवाब देते और बेनी पर लगे तो मुलायम।
विज्ञापन


दोनों ही प्रदेश की राजनीति का कद्दावर चेहरा थे। समाजवादी पार्टी में बेनी का रुतबा भी वही था जो मुलायम का। लेकिन आज मुलायम बेनी की 'औकात' पूछ रहे हैं और बेनी मुलायम की 'ऐसी की तैसी' कर रहे हैं।

बेनी के मुंह से मुलायम के लिए लुटेरा, बेईमान और आतंकियों से रिश्ते जैसे शब्द निकल रहे हैं तो मुलायम बेनी को मंत्री पद से बर्खास्त करने की मांग कर रहे हैं।
विज्ञापन


आखिर ऐसा क्या हुआ कि उत्तर प्रदेश के इन दो कद्दावर नेताओं का लगभग 30 साल का राजनीतिक याराना टूट गया और 'जय और वीरू' (दोस्त) से 'ठाकुर और गब्बर' (दुश्मन) हो गए।

2007 में टूटा मुलायम से रिश्ता

समाजवादी पार्टी की राजनीति में ये वो दौर था जब अमर सिंह का रुतबा अपने चरम पर था। वरिष्ठ पत्रकार रतन मणि लाल के मुताबिक, 'पार्टी के हर छोटे बड़े फैसलों में अमर सिंह का दखल होने लगा था।

मुलायम के पुराने साथी मसलन बेनी प्रसाद वर्मा, रेवती रमण सिंह और आजम खां जैसे नेता हाशिए पर जाने लगे थे।'

बेनी और आजम जैसे नेता अमर के बढ़ते कद से परेशान थे। वे उन पर सपा के पुराने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा कर पार्टी में कॉर्पोरेट्स को घुसाने का आरोप लगा रहे थे।

मुलायम सिंह यादव पर अमर सिंह का प्रभाव इस कदर हावी था कि वह बेनी और आजम की बातों को सुनना भी जरूरी नहीं समझते थे।

2007 विधानसभा चुनाव

बेनी को ये उपेक्षा नागवार लगने लगी। उस समय विधानसभा चुनावों के टिकट वितरण में भी अमर सिंह की ही मनमानी चल रही थी।

रतन मणि लाल बताते हैं', पूर्वी उत्तर प्रदेश की राजनीति में बेनी का अच्छा-खासा दखल था। गोंडा, बाराबंकी, श्रावस्ती और बलरामपुर जिलों में बेनी बहुत ही ताकतवर थे।'

लेकिन अमर सिंह ने इन जिलों की विधानसभाओं में भी टिकट बांटने में बेनी की सलाह नहीं ली।

अमर ने बेनी के पसंदीदा उम्मीदवारों को तो टिकट दिया ही नहीं, उनके बेटे राकेश वर्मा को भी टिकट देने की जरूरत नहीं समझी।

बेनी के लिए ये हालात मुश्किल भरे थे। अंततः उन्होंने सपा छोड़ने में ही समझदारी समझी और विधानसभा चुनाव में 'समाजवादी क्रांति दल' नाम से नई पार्टी खड़ी कर दी।

2008 में कांग्रेस में हुए शामिल

2007 चुनावों में बेनी ने पार्टी खड़ी की और अपने प्रभाव वाले जिलों में उम्मीदवार भी खड़े किए। हालांकि उनके एक भी उम्मीदवार को जीत नहीं हासिल हुई और सपा को भी इसका नुकसान हुआ।

2008 में बेनी प्रसाद वर्मा ने अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में कर लिया। रतन मणि लाल के मुताबिक, 'बेनी का कांग्रेस में शामिल होना कई लिहाज से महत्वपूर्ण था। कांग्रेस के पास प्रदेश की राजनीति में ऐसा कोई चेहरा नहीं था जो बेनी के कद का हो। लिहाजा कांग्रेस ने उन्हें तेजी से आगे बढ़ाया ओर प्रदेश में अपना जनाधार वापस पाने की कोशिश की।'

2009 में बेनी प्रसाद वर्मा ने गोंडा से लोकसभा चुनाव लड़ा ओर जीते। 2011 में उन्हें केंद्र में कैबिनेट मंत्री बनाया गया।

बेनी का कांग्रेस में शामिल होना और कैबिनेट मंत्री बनना मुलायम को कतई रास नहीं आया। मुलायम बेनी के पार्टी छोड़ने और यूपीए सरकार में मंत्री बनने से बहुत ही नाराज हुए।

रतन मणि लाल के मुताबिक, 'बेनी और मुलायम ने 1978 के आसपास उत्तर प्रदेश की राजनीति में दस्तक दी थी। जनता दल के टूटने के बाद सपा के गठन में दोनों का बराबर योगदान था। सपा की मजबूत करने में कई बार बेनी ने मुलायम से भी आगे जाकर काम किया था। लेकिन 2007 में पार्टी से अलग होने और कांग्रेस में शामिल होने के बाद दोनों के बीच की दरार और गहरा गई।

मुलायम से जान का खतरा

फिलहाल दोनों की दुश्मनी इस कदर बढ़ चुकी है कि बेनी ने जब गृह मंत्रालय से जेड प्लस सुरक्षा मांगी तो मुलायम सिंह यादव से जान का खतरा होने को वजह बताया।

बेनी अब जब भी उत्तर प्रदेश जाते हैं मुलायम के खिलाफ कुछ ना कुछ जरूर बोलते हैं। अलग-अलग मौकों पर वे मुलायम को कुनबे मोह से डूबे हुए नेता और धोखेबाज तक बता चुके हैं।
विज्ञापन

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें