फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

विवाह का महाउत्सव मनाते रूद्रपुर के तीर्थ पुरोहित

विज्ञापन
रुद्रपुर नगर के पंडा टोली में विवाह उत्सव - फोटो : DEORIA
विज्ञापन
विवाह का महाउत्सव मनाते हैं रुद्रपुर के तीर्थ पुरोहित
विज्ञापन

पंडा टोली में एक ही रात में 31 जोड़ों ने लिए सात फेरे
आज भी कायम है वर्षों से चली आ रही परंपरा
एक तिथि पर होती पंडा समाज की सभी शादियां
सुरेंद्र वत्स
रुद्रपुर (देवरिया)। उपनगर के नसहरा और चौहट्टा वार्ड में गुरुवार की रात मुसलाधार बारिश के बीच 31 घरों से सज धज कर बारात निकली। बैंड बाजे की धुन पर थिरकते बाराती कन्या पक्ष के दरवाजे पर पहुंचे। मुहल्ले में एक साथ इतनी संख्या में विवाह उत्सव देखने नगर के अन्य मोहल्लों से लोग उमड़ पड़े। तीर्थ पुरोहितों के घर शादी की यह अनूठी परंपरा वर्षों से चली आ रही है।
विज्ञापन

पौराणिक महत्व के दुग्धेश्वर नाथ की धरती रुद्रपुर को हंस तीर्थ स्थल कहा जाता है। यहां पंडा समाज का करीब एक हजार परिवार आबाद है। पंडा समाज के लोग देशभर के तीर्थों में घूमकर जप अनुष्ठान और पुरोहित का काम करते हैं। इस समाज में शादी का अनूठा प्रचलन है। समाज के लोग लग्न के अंतिम दौर में एक साथ एक ही तिथि पर शादियां संपन्न कराते हैं। ऐसे में एक दिन शादी होने से हर साल एक रात में 20 से 30 जोड़े सात फेरे लेकर जन्म जन्मांतर के लिए वैवाहिक बंधन में बधते हैं। शादियां मोहल्ले में ही होती हैं। कभी-कभी एक घर के बारात उठकर बगल के दूसरे घर में कुछ दूर घूमकर आती है। गुरुवार की रात तेज बारिश के बीच धूमधाम से 31 जोड़ों की शादी संपन्न हुई। लोग एक बारात से दूसरे बारात में शरीक हो रहे थे। पंडा टोली में शादी की पुरातन परंपरा के संबंध में तीर्थ पुरोहित मनोज पांडेय ने कहा कि यह समाज विवाह का महाउत्सव मनाता है। वर्ष भर तीर्थों पर रहने के कारण पंडा समाज ने लग्न के अंतिम दिनों में सामूहिक रुप से विवाह करने का निर्णय लिया। यह बात अलग है विवाह का सामूहिक मंच नहीं होता। घरों से अलग-अलग बारात निकल कर लड़की पक्ष के दरवाजे पर पहुंचती है। सभी वैवाहिक कार्यक्रम लड़की वाले के घर में होता है। एक ही तिथि पर पूरे समाज के मांगलिक कार्यक्रम करने से खर्चा भी कम लगता है। इस दौरान चार पांच लोग मिलकर एक बैंड पार्टी तय लेते हैं। रोड लाइट और पटाखे वाले भी एक ही रात में कई बारात का ठेका लेते हैं। इस परंपरा की नींव बाप दादाओं ने रखी जिसे अगली पीढ़ी आगे बढ़ा रही हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें