अमर उजाला ब्यूरो
चित्रकूट। धर्मनगरी में चल रहे 46वें राष्ट्रीय रामायण मेले के दूसरे दिन संतों व विद्धानों ने श्रीराम कथा व्याख्या प्रस्तुत किया। जिसमें श्रीराम व भरत को एक दूसरे का प्रेरक बताया। वहीं आतंकवाद की निंदा करते हुए आतंकवाद को मिटाने में रामचरितमानस के आदर्शों को धारण करने की आवश्यकता बताया।
रामायण मेला में इटावा के संत विश्राम दास ने भरत चरित्र की विशेषता बताते उनके चरित्र को आचरण में उतारने की आवश्यक बताया। रामचरितमानस की चौपाईयों को प्रस्तुत करते हुए कहा कि ‘भरतहि सुमरहि राम को, जेहि न सुलभ सिय राम प्रेम को। जग जप राम, राम जप जेहि’ भरद्वाज मुनि जिसका प्रमाण दे रहे हैं। राम और भरत को एक दूसरे का प्रेरक बताया। मध्य प्रदेश के डबरा ग्वालियर के डा. लाल पचौरी ने राष्ट्रधर्म को व्याख्यापित करते हुए राष्ट्र के समर्पण का भाव बनाए रखने का आह्वान किया। वहीं आतंकवाद की निंदा करते हुए आतंकवाद को मिटाने में रामचरितमानस के आदर्शों को धारण करने की आवश्यकता बताया। ब्रह्मांड नायक राम ने आतंकवाद का सफाया करने के लिए शस्त्र उठाया और आतंक को जड़ से समाप्त किया। प्रथम सत्र का संचालन करते हुए प्रयागराज के डा. सीताराम सिंह विश्वबंधु ने रामचरितमानस के संदेशों को जीवन में उतारने का आह्वान किया। रामचरितमानस के प्रसंगों के माध्यम से छात्रों में नैतिक शिक्षा को अनिवार्य करने पर बल दिया।
श्री राम का मूल ऋग्वेद में ‘अ’ अक्षर से अभिहित
चित्रकूट। ग्लोबल एकेडमी ओनिंग द गीता के कुलाधिपति तिरुपति से पधारे ब्रह्मर्षि प्रो. तिरुपति स्वामी जी ने कहा कि राम और रामायण अभिन्न हैं तथा राम का मूल ऋग्वेद में ‘अ’ अक्षर से अभिहित है। यह ‘अ’ अक्षर ही सभी वर्णों का मूल बीज है। इस तरह से राम एक ऐसा नाम हैं जिसका अवतरण द्वारा दशरथ पुत्र श्रीराम से सीधा संबंध बनता है और इसी आज के विज्ञान ने यह कहकर सत्य बता दिया कि जो समुद्र में सेतु है वह अयोध्या के नरेश राम के द्वारा निर्माण कराया गया जो ऐतिहासिक है और अब राम और उनकी अयोध्या के अस्तित्व के विषय में किसी प्रकार का कुतर्क या कुप्रमाण अमान्य हो गया है। साहित्यकार पदमश्री डा. सरोज गुप्ता ने कहा कि संत तुलसीदास ने अपने धर्म रथ को लिंग, वर्ण, जाति आदि के भेदभाव से परे रखा है। गोष्ठी मेें साहित्यकर डा. चन्द्रिका प्रसाद दीक्षित ने बताया कि महाकवि तुलसीदास को मानवता के लिए शताब्दियों तक याद किया जाएगा। डा. उदय शंकर दुबे व छेदीलाल कांस्यकार औरंगाबाद ने कहा कि कहाकि रामकथा को विश्व में पहुंचाने के लिए रामलीलाओं का सहारा लिया। वहीं नाटक शैली में राम के चरित्रों को लेकर जनता में भक्ति और सदाचार की स्थापना के प्रयोग किए गए जो सफल रहे।