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मूल निवासी की जीवन शैली सुधारने की जरूरत

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चंदौली के पीडीडीयू नगर में विश्व आदिवासी (मूल निवासी) दिवस पर विभिन्न संगठनों की ओर से हुई गोष्ठी में आदिवासियों के जीवन स्तर को सुधारने का आह्वान किया गया। इस दौरान आदिवासियों की वर्तमान दशा, आदिवासी दिवस की महत्ता पर प्रकाश डाला गया।
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भारत वर्षीय गोंड आदिवासी महासभा (समिति) के परशुरामपुर स्थित कैंप कार्यालय पर हुई बैठक में आदिवासी (मूल निवासी) जीवन शैली पर प्रकाश डाला गया। इस दौरान आदिवासियों की स्थिति को सुधारने के लिए योजना बनाने की मांग की गई। वक्ताओं ने कहा कि यूएनओ की पहली बैठक 1982 में एक कमेटी का गठन किया गया। इसमें विश्व के सभी मूल निवासियों के जीवन शैली का अध्ययन किया गया। इसमें पाया गया कि आदिवासी गरीबी, अशिक्षा,बंधुआ मजदूरी, स्वास्थ्य और बेरोजगारी की समस्या से ग्रसति हैं। नौ अगस्त 1993 को सर्वसम्मति से विश्व आदिवासी दिवस मनाने की घोषणा की गई। कहा कि 2011 की जनगणना के अनुसार विश्व में भारत में 10 करोड़ 40 लाख आदिवासी हैं। गोंड, खरवार, भील, कोल, मुंडा सहित 246 जनजातियां हैं। सभा में आहवा्न किया गया कि आदिवासियों केे बचाने के लिए जल, जंगल जमीन और संविधानिक हक दिया जाए। गोष्ठी में लललन लाल गोंडे, संचालन रिवशंकर गोंड ने किया।
अखिल भारतीय गोंड महासभा की ओर से महमूदपुर रोड स्थित एक स्कूल परिसर में आयोजित गोष्ठी में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के गंगेश शाह गोंडवाना ने कहा कि मूल वासियों की भाषा और संस्कृति, समाज विशेष्ज्ञ की वास्तविक पहचान होती है। हम सभी का उत्तरदायित्व है कि इसका संरक्षण और संवर्धन करें। इ
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