अच्छा पैकेज मिलने पर सात अप्रैल को सूडान के खारतून शहर के अकीकबीद मुहल्ले में पहुंचे। जमील ने बताया कि तीन चार दिन काम किया कि 15 अप्रैल से गृहयुद्ध शुरू हो गया। बम और गोलियों की बरसात शुरू हो गई। तीन दिन सात लोगों के साथ कमरे में ही बंद रहा। जब-जब बम के गोले गिरते तो बिल्डिंग थर्रा जाती और लगता मौत छूकर निकल गई। बिजली चली गई, पानी आपूर्ति बंद हो गई और खाना भी खत्म हो गया। ऐसे में मैने वीडियो बनाया और सोशल साइट पर डाल दिया।
इसी बीच भारतीय दूतावास ने संपर्क साधा और कहा कि वे दूतावास तक चले आए लेकिन घर से निकलना मुकिश्ल था। बाद में हम लोग जान बचाने के लिए निजी वाहन से वहां से दो घंटे की दूरी पर बेलावेद पहुंचे। लगा की जान बच जाएगी लेकिन यहां और तेज गोलीबारी शुरू हो गई। यहां से वाहन से हम लोग फिर से खारतून पहुंचे। कहा कि यहां नील नदी के पुल पर बस पर गोलियां बरसाई गई। किसी तरह 23 अप्रैल को इंद्रमान मिलिट्री बेस पहुंचे। यहां से एयरोप्लेन से जेद्दा पहुंचा, जहां से दिल्ली पहुंचा। यहां से यूपी भवन से भोजन कराकर वाराणसी और यहां से पीडीडीयू नगर घर पहुंचाया गया।
सूडान से जमील अहमद के सुरिक्षत घर वापसी को परिवार वाले मौत के मुंह से वापस आना मान रहे हैं। परिवार वालों में खुशी का माहौल है। पिता बशीर अहमद, माता मेहरूनिशा, पत्नी दरख्शा परवीन, बेटियां राइमा, आरिफा पिता से लिपट कर खूब रोई। माता कहती है कि जब से सूडान में युद्ध की बात सुनी थी तब से घर में मातम पसरा था। उपर वाले का और सरकार का शुक्र है कि बेटा सुरक्षित वापस लौट आया।
सूडान से वापस लौटे जमील अहमद ने बताया केंद्र और प्रदेश सरकार ने उसकी जान बचाई है। कहा कि जेद्दा में विदेश मंत्री एस जयशंकर पहुंचे और हालचाल लिया। यही नहीं वहां के सुल्तान ने भी हम लोगों का भव्य स्वागत किया। वहां से दिल्ली लौटने पर सरकारी अधिकारियों ने भोजन कराया और स्वागत किया। यहां से प्रदेश सरकार ने घर तक पहुंचाया। यही नहीं पल-पल हम लोगों का हाल चाल लेते रहे।