नियामताबाद। धान की अधिक पैदावार पाने के लिए किसानों को इसमें लगने वाले रोगों की रोकथाम करना बहुत ही आवश्यक है। यदि किसान समय पर धान में लगने वाले रोगों को रोक लेंगे तो उन्हें निश्चित रूप से अच्छी पैदावार मिलेगी। यह बातें पोटेंट बायो रिसर्च प्रयागराज के कृषि विशेषज्ञ आदित्य कुमार सिंह ने बुधवार को सामाजिक संस्था भारतीय विकास समिति की ओर से संस्था के गोधना चौराहा स्थित कैंप कार्यालय में किसान गोष्ठी के दौरान कहीं।
उन्होंने कहा कि धान की फसल में ज्यादातर खैरा रोग लगता है जिसकी रोकथाम के लिए प्रति हेक्टेयर पांच किलोग्राम जिंक सल्फेट व ढाई किलोग्राम चूना या 20किलोग्राम यूरिया को एक हजार लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। धान के तनाछेदक कीट की रोकथाम के लिए ट्राईकोग्रामा नामक परजीवी को आठ से दस दिन के अंतराल पर छोड़ना चाहिए। प्रति हेक्टेयर 20 किलोग्राम कारबोफ्यूरान दवा का भी प्रयोग किया जा सकता है। बताया कि खेत में साढे चार सेंटीमीटर पानी होने पर ही इन दवाओं का प्रयोग करना चाहिए। वहीं क्लोरपायरिफॉस डेढ़ लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छह सौ लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने पर भी इस बीमारी से धान की फसल को बचाया जा सकता है। वहीं धान में फुदके से बचाव के लिए फोरेट प्रति हेक्टेयर 10 किलोग्राम या मोनोक्रोटोफॉस डेढ़ लीटर पौधों के निचले भाग पर छिड़काव करना चाहिए। कहा कि धान की फसल से अधिक उपज के लिए खेत में हमेशा पानी भरा रहना आवश्यक नहीं है। वर्षा न होने की स्थिति में छह से सात दिनों के अंतराल पर सिंचाई करना भी इसके लिए पर्याप्त है। इस मौके पर दलसिंगार, कपिलदेव, सुजीत, अजीत, मनोज, रामअवतार आदि मौजूद रहे।