इस अवसर पर पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने राजदरी की प्राकृतिक छटा की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हुए कहा कि राजदरी की हरी-भरी वादियां और यहां का प्राकृतिक वातावरण मुझे हमेशा अपनी ओर आकर्षित करता है। प्रकृति की गोद में गूंजते लोकगीत कलाकारों को एक अलग ही ऊर्जा और आत्मिक आनंद देते हैं।
जलप्रपात की कल-कल ध्वनि और घने जंगलों के बीच गूंजती कजरी की स्वर लहरियों ने पूरे वातावरण को संगीतमय बना दिया। प्रतिभागियों और स्थानीय ग्रामीणों ने इस आयोजन को लोक संस्कृति के संरक्षण के साथ-साथ पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण प्रयास बताया। आयोजकों के अनुसार आगामी दिनों में भी कार्यशाला में कजरी गायन के विभिन्न स्वरूपों और पारंपरिक शैलियों का प्रशिक्षण दिया जाएगा।