सूर्य को अर्घ्य देती व्रती महिला
कांच ही कांच के बहंगियां बहंगी लचकत जाए। मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा जाए मुरझाए आदि गीतों के बीच सूर्य चैत्र षष्ठी व्रत करने वाले व्रतियों ने उदयाचल सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया। इस दौरान सरोवरों, तालाबों के किनारे अर्घ्य देने वालों की भीड़ उमड़ी। इसके बाद व्रतियों ने 36 घंटे का उपवास तोड़ा।
लोक आस्था का महापर्व चैत्र मास के छठ के अंतिम दिन व्रतियों ने मुंह अंधेरे गीत गाते हुए विभिन्न सरोवरों पर पहुंची।यहां कलश स्थापित कर सूर्य देव की पूजा अर्चना गई। इसके बाद कमर भर पानी में खड़े होकर सूर्योदय का इंतजार किया गया। जैसे ही आसमान में सूर्य की लालिमा दिखी उनके नाम से जल, दूध आदि से अर्घ्य दिया। इसके पूर्व अर्घ्य की तैयारियां घरों में पूरी रात चली। मुंह अंधेरे ही उठ कर अर्घ्य के लिए फलो, पकवान और पूूजा सामग्रियों से सूप, दउरी आदि सजायी गई। इसके बाद व्रती पूरे परिवार के साथ नए वस्त्र पहन कर गीत गाते हुए कलश हाथों में लेकर घाटों की ओर चले। पुरुष सदस्य माथे पर फलों का दउरा और सूप तथा हाथों में गन्ना लेकर चल रहे थे। इस दौरान पूरे रास्ते छठ के गीत गूंजते रहे और माहौल भक्ति मय रहा। नगर के मानसनगर स्थित मानसरोवर तालाब पर अर्घ्य देने के लिए सर्वाधिक भीड़ रही। इसी तरह आरपीएफ कालोनी, दामोदरदास पोखरा सहित अन्य तालाबों पर व्रतियों की भीड़ जुटी। इस दौरान तालाबों के समीप सुबह मेला का दृष्य रहा। हालांकि भीड़ कम होने की वजह से घाटों पर विशेष इंतजाम नहीं किए थे लेकिन तमाम अव्यवस्थाओं पर आस्था भारी पड़ी।