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पितृ सत्तात्मक समाज के कारण नारी अस्मिता पर संकट

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चकिया। स्थानीय सावित्री बाई फूले राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के विवेकानंद सभागार में रविवार से नारी अस्मिता संघर्ष, साहित्य समाज एवं विधान विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ। संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष डा. उमाकांत यादव ने कहा कि भारत में पितृ सत्तात्मक समाज के कारण नारी को हमेशा अपने अस्तित्व एवं अस्मिता के लिए संघर्ष करना पड़ा है।
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उन्होंने कहा कि परिवार से लेकर समाज तक नारी को दोयम दर्जे का नागरिक माना है, जिससे नारी की सामाजिक, आर्थिक प्रगति पुरुषों की अपेक्षा काफी कम हुयी है। संगोष्ठी मेें काशी हिंदू विश्वविद्यालय समाजशास्त्र विभाग की सहायक प्रोफेसर डा. प्रतिमा ने कहा कि महिलाओं की सामाजिक स्थिति पर विचार व्यक्त किया। विशिष्ट अतिथि रांची विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष डा. जंगबहादुर पांडेय ने कहा कि वैदिक काल, रामायण काल, महाभारत काल में महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार थे तथा कर्तव्य भी पुरुषों की अपेक्षा अधिक थे। संगोष्ठी का आरंभ संयोजक रमाकान्त गोड़ की विषय स्थापना के साथ हुआ। इसके पूर्व महाविद्यालय की छात्राओं ने सरस्वती वंदना तथा स्वागत गान प्रस्तुत किया। इस अवसर पर प्राचार्य डा. संगीता सिन्हा, डा. मिथिलेश सिंह, डा. अमिता सिंह, डा. विजयलक्ष्मी, डा. शमशेर बहादुर सिंह, डा. सरवन कुमार यादव सहित तमाम शोध छात्र तथा महाविद्यालय की छात्र-छात्रायें मौजूद रही।
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