किसानों की आय को दोगुनी करने के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सपनों को साकार करने की नई पहल कृषि वैज्ञानिकों ने की है। जिसके तहत वेस्ट-डी-कम्पोजर का निर्माण किया गया है। जनपद में वेस्ट-डी-कम्पोजर बनाने की पहल नेवाजगंज गांव के किसान अनिल कुमार सिंह ने की है। वेस्ट-डी-कम्पोजर बीज शोधन, भूमि शोधन के अलावा कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट बनाने में भी कारगर भूमिका अदा करता है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा स्थापित राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र गाजियाबाद के कृषि वैज्ञानिकों ने इस वेस्ट-डी-कम्पोजर का निर्माण किया है।
नेवाजगंज गांव के किसान अनिल कुमार सिंह ने अपने घर पर वेस्ट-डी-कम्पोजर बनाना आरंभ कर दिया है। वेस्ट-डी-कंपोजर की खूबियों एवं उसे बनाने की आसान तकनीक बताते हुए उन्होंने बताया कि वेस्ट-डी-कंपोजर बनाने के लिए वैज्ञानिकों ने देशी गाय के गोबर में मौजूद कीटों की सहायता ली है। उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार 20 रुपये में किसानों को वेस्ट-डी-कंपोजर की एक शीशी बेच रही है। उन्होंने कहा कि यह एक शीशी दवा आजीवन किसान को फायदा पहुंचाती रहेगी। वेस्ट-डी-कंपोजर बनाने की तकनीक बताते हुए उन्होंने कहा कि 200 लीटर पानी में 2 किलो गुड़ तथा वेस्ट-डी-कम्पोजर की एक शीशी मिलाकर घोल को एक सप्ताह तक सुबह-शाम अच्छी तरह से लकड़ी द्वारा मिलाया जाता है। एक सप्ताह में घोल मटमैले रंग का हो जाता है। इस घोल को दही की जोरन के तरह लगातार इस्तेमाल कर वेस्ट-डी-कम्पोजर बनाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि वेस्ट-डी-कंपोजर का प्रयोग गोबर पर करके उसे वर्मी कंपोस्ट बनाया जा सकता है तथा कृषि कचरा, रसोई कचरा को इसके माध्यम से कंपोस्ट खाद के रूप में परिवर्तित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इसके उपयोग से रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग में 60 प्रतिशत तक कमी की जा सकती है। इससे फसल पर कोई रोग नहीं लगता। उन्होंने कहा कि फसल पर छिड़काव करने से फसल की गुणवत्ता अच्छी हो जाती है। उन्होंने कहा कि यह बीज शोधन तथा भूमि शोधन में कारगर है तथा मिट्टी के भौतिक रासायनिक एवं जैविक गुणों का संरक्षण करता है।