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केंद्र और यूपी की सियासी रार में उलझी मनरेगा

Tue, 19 Feb 2013 09:06 AM IST
महेंद्र तिवारी/लखनऊ
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सूबे की सपा सरकार केंद्र की यूपीए सरकार की वैसे ही खेवनहार है जैसे की बहुजन समाज पार्टी। मुश्किल की घड़ी में यूपीए की नैया पार कराने वाले दलों में सपा की भूमिका हमेशा बढ़कर ही साबित हुई है। मगर इस सियासी जुगलबंदी का फायदा बसपा के जमाने जैसा भी अब यूपी को नहीं मिल रहा है। केंद्र सरकार की फ्लैगशिप स्कीम महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) इसका एक उदाहरण है।
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पिछले तीन सालों में यह पहला मौका है जब सबसे कम धनराशि प्रदेश को मिली है। प्रदेश को पिछले साल मिले 4,24,048 लाख रुपये के बजट का एक तिहाई भी अब तक नहीं मिल पाया है। प्रदेश को अब तक केवल 1,170.29 लाख रुपये ही मिल सके हैं। बजट की कमी का खामियाजा भुगत रहे हैं सूबे के मजदूर।

सूबे में मनरेगा का काम देख रहे एक वरिष्ठ अफसर बताते हैं कि इस बार केंद्र सरकार ने जून 2012 में 700 करोड़ रुपये का पहला केंद्रांश जारी करते हुए अगली किस्त के लिए यहां के सिस्टम की कई खामियां गिनाकर पहले उसे दूर कराने की शर्त लगा दी थी।
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इसके बाद प्रदेश सरकार ने एक-एक शिकायत का निराकरण कराया। दो साल के कामकाज का आडिट करवाकर उसकी भी रिपोर्ट भेजी गई। केंद्र सरकार ने अपनी आपत्तियों के निस्तारण की बात लिखित रूप से स्वीकार कर लिया। साथ ही केंद्रांश में 470.29 करोड़ फिर जारी किया। मगर इसके बावजूद बजट का आगे का हिस्सा जारी नहीं हो पा रहा है।

यह मामला सिर्फ अफसरों की लिखा-पढ़ी तक ही सीमित नहीं रहा है। जानकार बताते हैं कि विभागीय मंत्री अरविंद कुमार सिंह गोप भी इस संबंध में केंद्रीय मंत्री से कई बार बात कर चुके हैं लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। इससे गांवों में काम ठप होने जैसी स्थिति है। मजदूरों को उनकी मांग के हिसाब से काम नहीं मिल पा रहा है।

काम की निगरानी से जुड़े तंत्र के मानदेय के लाले पड़ गए हैं। ग्राम्य विकास आयुक्त ने हाल ही में दूसरी किस्त न मिलने की वजह से योजना पर पड़ रहे विपरीत असर का हवाला देते हुए एक बार फिर बकाया राशि के आवंटन के लिए केंद्र सरकार को लिखा है। इसके पहले नवंबर से जनवरी के बीच करीब आधा दर्जन पत्र लिखे जा चुके हैं।

वित्तीय वर्ष         स्वीकृत बजट             प्राप्त केंद्रांश(लाख रुपये में)
2010-11           8,77,900 लाख रुपये             5,26,658.9
2011-12           8,78,724 लाख रुपये             4,24,048.0
2012-13           7,00351 लाख रुपये              1,17,029.1

केंद्र की आपत्तियां
-उपलब्ध धनराशि के सापेक्ष खर्च कम होना
-वर्ष 2010-11 के आरंभिक और अंतिम अवशेष के आंकड़ों में असमानता
-प्रदेश में सोशल आडिट यूनिट की स्थापना न होना
-वर्ष 2011-12 के अंतिम अवशेष आंकड़ों में स्थायित्व न होना
-योजना में प्राप्त शिकायतों पर बड़ी संख्या में कार्रवाई का लंबित होना

ये की गई कार्यवाही
प्रदेश के ग्राम्य विकास विभाग का दावा है कि उसने इस संदर्भ में केंद्र सरकार की सभी आपत्तियों का निस्तारण कराने के साथ ही 2010-11 व 2011-12 का आडिट करवाकर अंतिम उपभोग प्रमाणपत्र और आडिट रिपोर्ट भी केंद्र सरकार को भेज दी। इसके अलावा 2012-13 का अंतिम उपभोग प्रमाणपत्र भी केंद्र सरकार को भेज दिया गया। इसके बाद केंद्र सरकार ने 20 दिसंबर 2012 को लिखकर दे दिया कि प्रदेश स्तर से अपेक्षित कोई अभिलेख लंबित नहीं है। बावजूद इसके अनुमोदित बजट का अगला हिस्सा प्रदेश को नहीं मिल पा रहा है।

बजट का लेखा-जोखा
-वित्तीय वर्ष 2012-13 के लिए केंद्र सरकार से अनुमोदित बजट: 7,003.51 करोड़।
-इससे प्रदेश में 52.32 लाख परिवारों को मिल सकता है लाभ।
-3,394.97 लाख मानव दिवस सृजित करने का लक्ष्य।
-इस बार 04 जून 2012 को यूपी को मिला 700 करोड़ रुपये। साथ में लगाई कई आपत्ति।
-आपत्तियां दूर किए जाने के बाद मिला 470.29 करोड़ रुपये।
-अब तक कुल 1,170.29 करोड़ रुपये ही मिला है।
-इस तरह यदि पिछले वर्ष का आरंभिक अवशेष 1654.71 करोड़ जोड़ दें तो इस सत्र के लिए खर्च को उपलब्ध धनराशि अनुमोदित बजट का एक तिहाई ही किसी तरह पार हो पाता है।

न ये केंद्र की सुन रहे न केंद्र सुन रहा यूपी का
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश प्रदेश सरकार से मनरेगा के कार्यों में सोनभद्र, बलरामपुर, संतकबीरनगर, गोंडा, महोबा, मिर्जापुर और कुशीनगर जैसे जिलों में हुई धांधली की सीबीआई जांच की सिफारिश की मांग करते रहे हैं। चार दिसंबर 2012 को उन्होंने लखनऊ मनरेगा के एक कार्यक्रम में आने पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मुलाकात में एक बार फिर यह मामला उठाया था।

उन्होंने कहा था कि पिछली सरकार के कार्यकाल के इस घपलों में शामिल अफसरों को नहीं बचाया जाना चाहिए। इसके पहले भी वह यह मामला उठा चुके थे। इस मुलाकात में प्रदेश सरकार की ओर से मनरेगा के बकाया धनराशि के आवंटन का मामला उठाया गया था। केंद्रीय मंत्री ने लंबित धनराशि शीघ्र जारी कराने का भरोसा दिया था। मगर करीब दो महीने बीते गए न तो प्रदेश सरकार ने केंद्रीय मंत्री की मांग पर गौर किया और न ही केंद्र सरकार से बकाया बजट आवंटित हुआ।

केंद्र और राज्य के बीच यह द्वंद्व इस स्थिति के लिए एक बड़ी वजह माना जा रहा है। विभागीय हलकों में चर्चा ये भी है कि केंद्रीय मंत्री ने जिस अवधि की सीबीआई जांच की संस्तुति करने का आग्रह मुख्यमंत्री से किया था वह कालखंड पिछली बसपा सरकार के समय का है। ऐसे में वह कौन सी बात है जिसकी वजह से सरकार इसकी अनमुति देने में झिझक रही है और केंद्र भी उपेक्षा का रुख अपनाने में लग गया है। 
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