डिबाई/नरौरा। डिबाई/नरौरा। हम तो खुशी-खुशी मां के दर्शन करने जा रहे थे... गाड़ी में सब हंस-बोल रहे थे... पता नहीं अचानक क्या हुआ कि पलक झपकते ही मेरी पूरी दुनिया उजड़ गई। अस्पताल के बेड पर दर्द से कराहती 20 वर्षीय ललिता जब ये शब्द बोलती है, तो सुनने वाले हर शख्स का कलेजा कांप उठा।
दिल्ली-बदायूं हाईवे पर शुक्रवार दोपहर हुए भीषण सड़क हादसे ने ललिता की मांग का सिंदूर और गोद दोनों एक साथ सूने हो गए। जिस ललिता का संसार कुछ मिनट पहले तक पति की मुस्कान और एक साल की बेटी की किलकारियों से आबाद था, वह अब पूरी तरह वीरान हो चुका है। हादसे में उसके ससुर रामदीन, पति लोकेंद्र, एक वर्षीय मासूम बेटी प्रगति और जेठानी बबीता की सांसें उसकी आंखों के सामने हमेशा के लिए थम गईं।
अस्पताल में गंभीर हालत में भर्ती ललिता सुध-बुध खो चुकी है। जब भी उसे होश आता, वह सिर्फ अपनी बच्ची प्रगति और पति लोकेंद्र को पुकारने लगती है। बदहवास ललिता ने रुंधे गले से बताया कि चौंढेरा स्थित देवी मंदिर में दर्शन करने के बाद पूरा परिवार बेहद खुश था। वहां पूजा-अर्चना कर सभी लोग बेलौन भवानी के दर्शन के लिए निकले थे।
ललिता के मुताबिक, मुझे नहीं पता हादसा कैसे हुआ। अचानक गाड़ी जोर से लहराई और इधर-उधर भागने लगी। चालक ने संभालने की कोशिश की, लेकिन सब कुछ सेकंडों में हो गया। एक भयानक गड़गड़ाहट और धमाके के साथ गाड़ी पेड़ से टकरा गई। इसके बाद सिर्फ अंधेरा छा गया। ललिता ने बिलखते हुए बताया कि टक्कर के बाद जब उसे हल्का सा होश आया, तो गाड़ी के अंदर का मंजर किसी डरावने सपने जैसा था।
चारों तरफ चीख-पुकार मची थी और लोहे के मुड़े हुए ढांचों के बीच सभी खून से सने पड़े थे। उसने देखा कि कुछ देर पहले तक हंस रहे उसके ससुर रामदीन और जेठानी बबीता बेसुध पड़े थे। ललिता ने रोते हुए बताया, उन्होंने अपनी बच्ची प्रगति को ढूंढा, वह खून से लथपथ बेजान पड़ी थी। पति लोकेंद्र को हिलाकर जगाने की कोशिश की, लेकिन उनकी सांसें थम चुकी थीं। हादसे में मेरा तो सब कुछ लुट गया, अब मैं किसके सहारे जिऊंगी?
एक साल पहले ही बेटी के पैदा होने पर दोगुनी हुई थीं खुशियां
ललिता और लोकेंद्र की शादी को अभी कुछ ही साल हुए थे। एक साल पहले बेटी प्रगति के जन्म के बाद परिवार में खुशियां दोगुनी हो गई थीं। नवरात्र पर ललिता अपनी मासूम बच्ची को मां भगवती के चरणों में माथा टिकवाने ले जा रही थी, जिससे कि बेटी पर देवी की कृपा बनी रहे। लेकिन, नियति को कुछ और ही मंजूर था। अस्पताल के वार्ड में जब भी डॉक्टरों या तीमारदारों की नजर ललिता की सूनी मांग और उसकी सिसकियों पर पड़ती है, तो वार्ड में मौजूद हर आंख छलक उठती है। शारीरिक चोटों के दर्द से कहीं ज्यादा गहरा वह जख्म है, जो ललिता को जिंदगी भर का अकेलापन दे गया है।