शासन के निर्देश पर टीम का नेतृत्व कर रहे अपर प्रमुख वन संरक्षक
जहां पौधे बताए गए, वहां दूर तक मिली झाड़ियां, नहीं नजर आ रहे पौधे
कादरचौक ब्लाक क्षेत्र के गांव उलाई खेड़ा के जंगल में पहुंचकर टीम ने पौधारोपण की जांच की। दूर-दूर तक टीम को पौधे नजर नहीं आ रहे थे। जबकि बड़ी तादाद में पिछले वर्ष 2008 से यहां कई बार पौधारोपण हो चुका है। करीब 182 हेक्टयर जमीन में टुकड़ों में पौधारोपण हुआ था। इस समय यह पौधे काफी बड़े होने चाहिए। निरीक्षण के दौरान अपर प्रमुख वन संरक्षक को यहां दूर-दूर तक पौधे नजर नहीं आएं हैं। यहां बता दें कि इस प्रकरण में कई बार जांचे हो चुकी हैं। तत्कालीन डीडीओ प्रदीप कुमार सोम ने तो अपनी जांच रिपोर्ट में पूरी तरह वन विभाग के पौधारोपण को फर्जी करार दे दिया था। यही नहीं जमीन को लेकर भी यहां विवाद बना हुआ है।
शासन स्तर से कराई गई जांच अभी दो-तीन दिन तक चल सकती है। फिलहाल, जांचकर लौटे अपर प्रमुख वन संरक्षक भुप्पल का कहना है कि अभी जांच शुरू हुई है। अभी से कुछ नहीं कहा जा सकता है। हालांकि उन्होंने माना है कि इस जमीन को लेकर भी विवाद रहा है। निरीक्षण में डीएफओ समीर कुमार, एसडीओ ईश्वर दयाल, वन और राजस्व विभाग के अधिकारी रहे।
राजू प्रधान की लंबी लड़ाई का परिणाम है जांच
बदायूं। पिछले आठ साल से मजरा गंगवरार के प्रधान राजेश्वर सिंह उर्फ राजू कश्यप वन विभाग के भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने वर्ष 2008 में लड़ाई शुरू की जो जिला स्तर से लखनऊ स्तर तक पहुंची लेकिन परिणाम हासिल नहीं हुए। जांच के नाम पर लीपापोती होती रही। बाद में उन्होंने कोर्ट का सहारा लिया और हाई कोर्ट में उन्होंने अपनी याचिका दायर कर ली है। पिछले दिनों कोर्ट ने इस प्रकरण में शासन से रिपोर्ट तलब कर ली है। शासन ने वन विभाग की उच्च स्तरीय टीम गठित कर जांच कर सभी जानकारियां जुटाई हैं, ताकि कोर्ट को स्थिति से अवगत कराया जा सके।
शिकायत के इन तर्कों का जवाब ढूंढना मुश्किल
लखनऊ से उच्च स्तरीय टीम यहां पहुंच गई है। इससे पहले भी जिला स्तर से जांच हुई हैं, लेेकिन जांच वन विभाग के खिलाफ जाती रही। बावजूद इसके मामले का टाला जाता रहा। मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया है। इसमें ये तर्क दिए गए हैं। अब तक हुई जांचों में खामियां पाए जाने पर क्या कार्रवाई हुई? अगर, भूमि वन विभाग की थी तो तहसील प्रशासन ने ग्रामीणों को पट्टे काटकर कैसे दे दिए? तहसील प्रशासन से लेकर राजस्व परिषद तक उस क्षेत्र का नक्शा नहीं था तो सीमांकन कैसे हो गया? जिला कासगंज और बदायूं के अधिकारियों ने वन विभाग के अधिकारियों के साथ किस नक्शा पर जमीन का विवाद सुलझाया? वन विभाग का नक्शा अगर है तो उसमें राजस्व की सीमा भी तो राजस्व बताएगा। सीमा कहां से शुरू हुई है?
वन विभाग की जगह नहीं थीं, तो किसानों की जमीनों पर पौधरोपण क्यों किया गया?
वन विभाग ने 182 हेक्टेयर में पौधरोपण, हरित पट्टी आदि पर पौधरोपण किए वे पौधे कहां हैं?
इन पौधों को लगाई गई बाड़ और तारकसी आदि में क्या हुआ? जिला स्तरीय जांच में खामियां मिलने पर संबंधित जिम्मेदारों से क्या और कितनी वसूली हुई और उन्हें क्या सजा मिली?