नगर से सटा गांव अजनावर मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। आधा गांव खुले में शौच जाता है। दो ही शौचालय पूरे गांव में बने हैं। भीषण गर्मी में दो नल खराब होने से पेयजल की भी किल्लत है। वहीं तीन साल में सात सौ मीटर कच्ची सड़क ही बन पाई है। नगर से मात्र दो किमी दूर स्थित ढाई हजार आबादी का गांव अजनावर में विकास के नाम पर कुछ भी नहीं हुआ है। पिछले वित्तीय वर्ष में गांव का सर्वे हुआ। चार सौ शौचालयों की आवश्यकता दर्शाते हुए शासन को रिपोर्ट भेजी गई, लेकिन उस पर प्रभावी अमल नहीं हुआ है। हालात ये हैं कि गांव की आधी आबादी खुले में ही शौच जाती है। स्वच्छ भारत निर्मल भारत का सपना टूटता नजर आ रहा है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि पूरे गांव में मात्र बीस घरों में ही शौचालय हैं। महिलाएं भी खुले में शौच जाती हैं। इस वित्तीय वर्ष के इन तीन महीनों में नाजिमा और मीना के घर में ही सरकारी धन से शौचालयों का निर्माण हो सका है।
गर्मी के मौसम में जब पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तो यहां लगे दो सरकारी हैंडपंप खराब हैं। हलक सुखाती गर्मी में हैंडपंप खराब होना भी गांव वालों की परेशानी बढ़ा रहा है। पांच इंदिरा आवासों के निर्माण को पहली किश्त ही जारी हुई है। अगर गांव की मुख्य सड़कों को छोड़ दिया जाए, तो मलिन बस्ती में गलियों में पानी भरा है। कई गलियां तो सड़क से नीचे हैं, जो बरसात के दिनों में तालाब बन जाती हैं। बहरहाल, जब नगर के समीप के गांव से विकास अछूता है तो फिर दूर स्थित गांवों के हालात कैसे होंगे? इसकी कल्पना की जा सकती है।
विकास की बात करने पर छलक आया दर्द
जब विकास की बात की तो गांव वालों के चेहरों पर दर्द छलक आया। अपनी धेवती को गोदी में संभाले बेबा जयदेई ने कहा कि उसे सरकारी सहायता के नाम पर कुछ नहीं मिला। कई बार की गई फरियाद भी अनसुनी कर दी गई। गली से गुजर रहे रामप्रकाश को जब कुरेदा, तो वह तपाक से बोले, विकास के नाम पर कुछ भी नहीं हुआ है गांव में। मोरश्री बोलीं, पानी भरने के लिए भी दूसरे के घर जाना पड़ता है। युवा दिनेश ने कहा कि गरीब की अब कोई नहीं सुनता। गांव में कई ऐसी गलियां हैं, जिनसे निकलना दूभर है।
बूढ़ी आंखों ने सपना देखना छोड़ दिया
बिसौली। भीषण गर्मी में काली पन्नी को तानकर रह रहे वृद्ध मेवाराम और रामश्री के हालात सत्यता को बयां कर रहे थे। अब तो बूढ़ी आंखों ने सपने भी देखने छोड़ दिए थे। हां, बस चिंता थी तो दो वक्त की रोटी की। कोटेदार से जो कुछ गल्ला मिला, उससे कटता है पूरा महीना। दो चार महीने वृद्धावस्था पेंशन मिली भी, लेकिन अब कुछ भी नहीं मिलता। मेवाराम बोले, मकान तो दूर की बात रही किसी ने सहानुभूति के दो शब्द भी नहीं कहे।
शासन से जिस योजना के लिए जो धन मिला वह खर्च हो रहा है। इंदिरा आवास के लिए प्रथम किश्त आ चुकी है। चार सौ शौचालयों के लिए प्रस्ताव शासन को भेजा गया है, अभी तक कोई स्वीकृति नहीं मिली है।
-महेशचंद्र शर्मा, ग्राम पंचायत सचिव
दो शौचालय बनने के लिए धन आया था। वृद्धावस्था और विधवा पेंशन के लिए सभी प्रार्थना पत्र शासन को भेजे जा चुके हैं। गांव के विकास के लिए प्रयास किया जा रहा है। जितना धन मिला, उससे काम करा दिए गए।
-गोवर्धन, ग्राम प्रधान