बहेड़ी गांव से स्टेडियम में संसाधन का भी अभाव पर बच्चों में जोश बरकरार
बदायूं। हौसला मजबूत और इरादा पक्का हो तो मुश्किल डगर भी आसान हो जाती है। कुछ ऐसा ही शहर से सटे बहेड़ी गांव के बच्चों ने कर दिखाया है। गांव नजदीक स्टेडियम में जूनियर हाईस्कूल के बच्चे हॉकी और वॉलीबॉल के गुर सीख रखे हैं। हालांकि लंबे समय कोच न होने से इन्हें कोई संसाधन भी नहीं मिल पा रहे हैं। बच्चों ने सीनियर खिलाड़ियों को गुरु मानकर मैदान पर प्रैक्टिस में जुटे हैं।
बहेड़ी गांव स्टेडियम से सटा है। यहां के कई खिलाड़ी बैडमिंटन व अन्य खेलों में नाम कमा चुके हैं और दूसरे शहरों में संघर्षरत हैं। बहेड़ी के नए खिलाड़ियों की नर्सरी स्थानीय परिषदीय जूनियर हाईस्कूल में तैयार हो रही है। निम्नवर्गीय परिवारों से जुड़े गांव के कई बच्चे पहले उझानी रोड के निजी स्कूल में पढ़ाई करते थे। स्कूल गांव से दूर था और फीस भी ज्यादा थी जो मजदूरपेशा पिता किसी तरह भरते थे। कोरोना की वजह से लॉकडाउन में खर्च और बढ़ा तो अभिभावकों ने निजी स्कूल से बच्चों के नाम कटवाकर गांव के जूनियर हाईस्कूल में उनका एडमिशन करा दिया। तीन साल पहले तक यही बच्चे स्टेडियम में जाकर कोच मुईनुद्दीन से हॉकी के गुर सीखते थे। तभी मुईनुद्दीन की अस्थायी कोच वाली सेवाएं समाप्त हो गईं और वह चले गए। तब से हॉकी व खेल संसाधन भी स्टेडियम के स्टोर से बच्चों को नहीं मिल पाते। अब बच्चों ने अपने गांव के ही उम्र में बड़े खिलाड़ी देवेंद्र कुशवाहा व पुष्पेंद्र को कोच मान लिया है। दोनों लोग इन्हें स्टेडियम में वॉलीबॉल के गुर सिखाते हैं।
मैं कक्षा सात का विद्यार्थी हूं। मेरे पापा मनोज राजमिस्त्री का काम करते हैं। हॉकी खेलना अच्छा लगता है पर हॉकी मिलती नहीं है। फिलहाल वॉलीबॉल खेल रहा हूं। - विवेक
मैं आठवीं में पढ़ता हूं। प्राइवेट स्कूल की फीस ढाई सौ रुपये महीने से बढ़कर पांच सौ रुपये महीने हो गई तो गांव के सरकारी स्कूल में दाखिला ले लिया है। हॉकी और वॉलीबॉल खेलना अच्छा लगता है। - रचित
- मैं सातवीं कक्षा में पढ़ता हूं। मेरे पिता ट्रैक्टर ड्राइवर हैं। सामान्य परिवार है। खेल पर ज्यादा खर्च नहीं कर सकते। बस घरवाले खेलने की इजाजत दे देते हैं, यही बहुत है। - करन
हम लोग अच्छा खेल सकते हैं। कई बार स्टेडियम की प्रतियोगिताओं में हमने यह बात साबित की है पर हमें न कोच मिलते हैं न संसाधन। गांव के खिलाड़ियों से ही सीख लेते हैं। - सौरभ
स्टेडियम में लंबे समय से कोच नहीं हैं। मैं और मुझसे बड़े देवेंद्र पहले स्टेडियम के कोचों से हॉकी व वॉलीबॉल समेत दूसरे खेलों की बारीकियां सीख चुके हैं। इसलिए खुद प्रैक्टिस करने के साथ ही नए खिलाड़ियों को भी सिखाने में गुरेज नहीं करते। कोई खिलाड़ी तरक्की कर गया तो हमारे गांव का ही नाम रोशन होगा। - पुष्पेंद्र