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पांच दिन में मलेरिया के सात सौ मरीज, कई डेंगू संदिग्ध भी

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बदायूं। हाईरिस्क ब्लॉक के 100 से ज्यादा गांवों में मलेरिया का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। कोरोना काल के बीच फैल्सीपेरम मलेरिया के मरीज भी बढ़ रहे हैं। इस बीच डेंगू के संदिग्ध भी मिलने लगे हैं। दातागंज, समरेर, जगत और सालारपुर ब्लॉक में मलेरिया का सबसे ज्यादा प्रकोप है। पूरे जिले की बात करें तो पांच दिन में मलेरिया के करीब 700 नए मरीज मिले हैं। फैल्सीपेरम मलेरिया के मरीजों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है।
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साल 2019 में जिले के दातागंज, समरेर, सालारपुर और जगत ब्लॉक में मलेरिया का जबरदस्त प्रकोप रहा था। कई लोगों की जान भी चली गई थी। शासन ने इन चार ब्लॉक के 100 गांवों को मलेरिया के लिहाज से हाईरिस्क एरिया घोषित कर दिया था। इन्हीं क्षेत्रों में इस साल जनवरी से अगस्त के बीच मलेरिया के मरीजों की संख्या आठ हजार तक पहुंच गई। हालांकि, यह पिछले साल के मुकाबले कम है। इधर, सितंबर और अक्तूबर माह में मलेरिया के साथ डेंगू का खतरा भी बढ़ जाता है। इस साल जिले में सितंबर माह के पहले पांच दिन में मलेरिया के करीब 700 नए रोगी मिल चुके हैं। इनमें 80 से ज्यादा फैल्सीपेरम के मरीज हैं।
इस बीच डेंगू के संदिग्ध मरीजों के मिलने का भी सिलसिला शुरू हो गया है। बड़ी तादाद में लोगों को टाइफाइड और वायरल फीवर भी गिरफ्त में ले रहा है। इसने भी स्वास्थ्य विभाग की चिंताओं को बढ़ा दिया है। दो दिन पहले ही जिले के हाईरिस्क ब्लॉक में जमीनी हकीकत जानने के लिए शासन स्तर से दो सदस्यों की टीम भी यहां दौरा कर चुकी है। हालांकि, स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी स्थिति सामान्य होने का दावा कर रहे हैं।
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वायरल फीवर, टाइफाइड का भी प्रकोप
संक्रामक रोगों के सीजन में वायरल फीवर और टाइफाइड का भी जिले के सैकड़ों गांवों में प्रकोप है। गांवों में हेल्थ कैंप के दौरान बड़ी संख्या में वायरल फीवर और टाइफाइड के मरीज मिल रहे हैं। कोरोना काल में बुखार के रोगियों की संख्या बढ़ने को लेकर भी स्वास्थ्य विभाग परेशान है। इसे देखते हुए सीएचसी, पीएचसी स्तर पर टीमों का गठन किया गया है। यह टीमें गांव-गांव जाकर लोगों की स्वास्थ्य जांच करके दवाएं दे रही हैं।
गंगा-रामगंगा के तटवर्ती गांव बढ़ा रहे चिंता
गंगा और रामगंगा के तटवर्ती गांव भी स्वास्थ्य विभाग की चिंताओं को बढ़ा रहे हैं। दातागंज और सहसवान तहसीलों में गंगा-रामगंगा के तटवर्ती गांवों में संक्रामक रोगों के साथ त्वचा संबंधी रोग दस्तक देने लगे हैं। कई ऐसे गांव भी हैं जहां स्वास्थ्य विभाग की टीमें नहीं पहुंच रही हैं। ऐसे में यहां के लोगों को निजी डॉक्टरों या फिर झोलाछाप से इलाज कराना पड़ रहा है।
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