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सब कुछ गवां कर आए थे, संघर्ष और मेहनत से बनाई पहचान

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बदायूं। स्वतंत्रता के साथ भारत विभाजन और नए मुल्क के रूप में पाकिस्तान का जन्म। इसके बाद भड़के दंगों ने हजारों परिवारों को सब कुछ छोड़ कर शरणार्थी बनने को मजबूर कर दिया। कई-कई दिन भूखे रहे। कैंपों में शरण ली, लेकिन उनमें से कई आज अपनी मेहनत के बल पर नामचीन हस्तियों में शुमार हैं।
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भारत विभाजन के बाद 1947 में पाकिस्तान से सैकड़ों शरणार्थी परिवार बदायूं भी आए। पाकिस्तान में उन्होंने सब कुछ गवां दिया। उनकी संपत्तियों पर कब्जे कर उन्हें वहां से भगा दिया गया। जान बचाकर भूखे-प्यासे ये लोग सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल कर बदायूं पहुंचे। कड़े संघर्ष के बाद शरणार्थियों ने अपनी मेहनत के दम पर परिवार को संभाला और खुद को स्थापित किया। पाकिस्तान से आए शरणार्थियों में कई आज जिले में बड़े कारोबारी और व्यापारी हैं। कभी वह रोजी-रोटी की तलाश करते थे आज लोगों को रोजगार देने का काम कर रहे हैं।
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चारपाई पर रख कर बेचीं टॉफियां अब बड़े होटल कारोबारी
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के झांग जिले से हिंसा के बीच रामलाल जुनेजा का परिवार किसी तरह जान बचाकर वहां से निकला था। कुनबे के करीब 150 लोग साथ थे। रामलाल जुनेजा का अब निधन हो चुका है उनके बेटे शहर के बड़े होटल कारोबारी गिरीश जुनेजा संघर्षों को याद करते हुए भारत विभाजन की त्रासदी को बताते हैं। वह बताते हैं कि सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल कर अटारी, अमृतसर होते हुए उनका परिवार दिल्ली पहुंचा। रास्ते में उनके चाचा भगवान दास की बेटी की गोली लगने से मौत हो गई। बेटी को किसी तरह वहीं दफन किया। परिवार के लोग दो-दो दिन भूखे रहे। बिल्कुल खाली हाथ थे। आटा सरकार देेती थी। परिवार बदायूं आया। यहां फेरी लगाकर कपड़े बेचने का काम शुरू किया। महिलाओं ने सिलाई-कढ़ाई करके हाथ बंटाया। गिरीश जुनेजा संघर्षों के दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि उन्होंने खुद चारपाई पर दुकान लगाकर टॉफियां बेचने का काम किया है। संघर्षों और मेहनत के दम पर अब उनका परिवार कामयाब है।
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पिता के सामने दंगाइयों ने तलवार से फाड़ दिया बुआ का पेट
शहर के बड़े रेडीमेड कारोबारी सुधीर मेंहदीरत्ता का परिवार पाकिस्तान के लाहौर के पास स्थित सरगोदा से पलायन कर बदायूं आया था। सुधीर के पिता इंद्रराज मेंहदीरत्ता का अब निधन हो चुका है। विभाजन की त्रासदी के बारे में सुधीर को उनके पिता ने बताया। सुधीर बताते हैं कि उनके परिवार और कुनबे के लोग ट्रेन में सवार थे। दंगाई ट्रेन में घुस आए। दंगाइयों ने पिता के सामने ही पिता की गर्भवती बहन रानी देवी का तलवार से पेट फाड़ दिया। उनकी मौत हो गई। परिवार के बाकी लोग किसी तरह जान बचा कर भागे। उनके पिता चार भाई थे। इनमें एक सहारनपुर, एक आगरा और एक दिल्ली में बस गए। परिवार ने कई जगह कैंपों में शरण ली और बाद में उनका परिवार बदायूं आ कर बस गया। पिता ने यहां बारदाना पर चीनी बेचने का काम किया। नफा के नाम पर पिता के पास चीनी के खाली बोरे बचते थे। इन बोरों को बेचने के बाद किसी तरह परिवार चलता था। पिता को लगता था कि वह फिर अपने घर जाएंगे, ऐसे में सब कुछ वहीं छोड़ आए थे। पिता ने काफी संघर्ष किया। अब उनका परिवार कामयाब परिवार है।
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एक महीने पैदल चले, कई-कई दिन रहे भूखे और प्यासे
अजीत सिंह नरूला का परिवार विभाजन की त्रासदी को नहीं भूला है। संघर्षों की लंबी कहानी है। करीब 97 साल के हो चुके अजीत नरूला को आज भी उस त्रासदी को याद कर सिहर उठते हैं। उनके बेटे हरेंद्र सिंह नरूला, सतनाम सिंह नरूला और जितेंद्र सिंह नरूला अब बड़े व्यापारी हैं। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के झांक से नरूला परिवार ने हिंसा के बीच पलायन किया था। सैकड़ों किलोमीटर पैदल चले। कई-कई दिन भूखे और प्यासे रहे। इस परिवार ने कई स्थानों पर शरणार्थी कैंपों में भी शरण ली। बदायूं पहुंचने के बाद साइकिल से फेरी लगाई। बाद में व्यापारियों से आर्डर लेकर दिल्ली से यहां लाकर कपड़े की सप्लाई की। कड़े संघर्ष और मेहनत के बल पर नरूला परिवार ने व्यापार में बड़ा नाम कमाया है। इस परिवार का साइकिल का बड़ा व्यापार है।
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