बदायूं। बिल्सी नगर निवासी मशहूर गीतकार व गजलकार नरेंद्र गरल जिले में अलग पहचान रखते हैं। वह मशहूर कवि उर्मिलेश शंखधार के साथ देश के बड़े मंचों पर काव्यपाठ कर चुके हैं। उनकी रचनाएं भी प्रकाशित हुईं हैं।
नरेंद्र गरल का असली नाम नरेंद्र मोहन जौहरी है। बिल्सी के मोहल्ला नंबर दो में उनका जन्म 18 मार्च 1951 को हुआ। शुरुआती शिक्षा बिल्सी में हुई। इसके बाद 1968 में कला स्नातक करने कछला स्थित पंडित गोविंद बल्लभ पंत डिग्री कॉलेज में प्रवेश लिया। गरल के मुताबिक उस वक्त कॉलेज प्राचार्य के रूप में प्रतिष्ठित ओज कवि ब्रजेंद्र अवस्थी कार्यरत थे। अवस्थी ने नरेंद्र गरल में साहित्य व कविता के प्रति ललक देखी तो उन्हें अपने खास शिष्यों में शुमार कर लिया।
गरल ने बताया कि परास्नातक की पढ़ाई के लिए वह 1972 में बदायूं आए तो यहां एनएमएसएन दास पीजी कॉलेज में ख्यातिलब्ध कवि डॉ. उर्मिलेश शंखधार का साथ मिला। तब उर्मिलेश के साथ ही डॉ. मोहदत्त साथी, विशुद्धानंदन मिश्र जैसे कला के पारखी लोगों के साथ उनका जुड़ाव हो गया। यहीं से उनका साहित्यक सफरनामा शुरू हुआ। उन दिनों साहित्यक गोष्ठी की बदायूं में समृद्ध परंपरा रही।
काव्य प्रेमी सप्ताह में कम से कम एक बार एकत्र होते थे। साथ ही विशुद्ध चर्चा व समीक्षा करते थे। बदायूं में उन दिनों साहित्य सृजन का स्वर्णिम काल था। इसके बाद वह अपने मूल नगर बिल्सी में शिफ्ट हो गए। वहां दो साल कोऑपरेटिव बैंक में नौकरी की। फिर नन्हूमल जैन इंटर कॉलेज में शिक्षक बन गए। वर्ष 2011 में वहां से रिटायर हो गए।
साहित्य साधना का सिलसिला आज भी जारी है। आकाशवाणी व दूरदर्शन पर कई बार उनकी रचनाएं प्रसारित हो चुकी हैं। बड़े कवि सम्मेलनों में शिरकत के साथ ही कई सम्मानों से उन्हें विभूषित किया जा चुका है।
-
प्रमुख रचनाएं
नरेंद्र गरल की पुस्तक हनुमत विनय का इसी साल विमोचन हुआ है। इसमें हनुमान जी से जुड़े 51 छंद हैं जो युवा वर्ग के लिए प्रेरणादायक हैं। साथ ही धार्मिक काव्य रचना श्री विष्णु सहस्रनाम भी प्रमुख कृतियों में शामिल है। इसके अलावा उनकी काव्य रचनाओं में ‘पानी में तेरा बिंब और तू डूबने लगे’ व दूसरी रचना..‘इतने करीब से कभी गहराइयां न देख’ विशेष रूप से सराही जाती हैं। गरल की कविता...नदी उमड़ी हुई है गांव वालों, बचाना है तो अपना घर बचा लो, अपने दौर की श्रेष्ठ रचनाओं में शामिल है।
-
गरल बोले- रचनात्मक कार्यों में आगे आएं युवा
सादा जीवन उच्च विचार सिद्धांत के अनुयायी नरेंद्र गरल मौजूदा दौर के कवि सम्मेलनों में हो रही फूहड़ता से व्यथित दिखते हैं पर कहते हैं कि हर चीज का एक दौर होता है। कभी उनका दौर था, आज नए कवि अपने तरीके से काव्य रचते और सुनाते हैं। काफी कुछ श्रोताओं का मूड भांपकर भी किया जाता है। वह कहते हैं कि युवाओं को रचनात्मक कार्य जैसे लेखन, काव्य में आगे आना चाहिए पर पहले अच्छी तरह से विषयवस्तु की जानकारी भी करनी चाहिए। संवाद
कवि नरेंद्र गरल। संवाद- फोटो : BADAUN